//उद्धत दंडक// जय राम रमा पति, कर विमल हमर मति, प्रभु बन जावय गति, जगत कर्म प्रधान । सतकर्म करी हम, जब तलक रहय दम, अइसन दौ दम-खम, जगत पति भगवान ।। जग के तैं पालक, भगतन उद्धारक, कण-कण के कारक, धरम-करम सुजान । प्रभु तोर सिखावन, हम सब अपनावन, मन ला कर पावन, अपन चरित बनान ।। -रमेश चौहान
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
7 घंटे पहले