अव्यवस्था के खिलाफ बियंग भरे सरसी छंद चित्र गुगल से साभार दू पइसा मा मँहगा होगे, गउ माता हा आज रे । कुकरी-कुकरा संग बोकरा, करत हवय अब राज रे। बइला के पूछारी नइ हे, भइसा ला झन पूछ रे । आनी बानी के मषीन मा, अब देखावय सूझ रे ।। सरकारी जमीन खाली हे, जाके ओला छेक रे । आज नहीं ता काली तोला, पट्टा मिलही नेक रे ।। कोला-बारी खेत बना ले, नदिया नरवा पाट रे। घर कुरिया अउ महल बना ले, छेकत रद्दा बाट रे।। सरकार नगत के डर्राथे, तोर हाथ मा वोट रे । मन भर ऊदा-बादी करले, कोने देही चोट रे ।। मनभर करजा कर ले तैं हा, होबे करही छूट रे । नेता भर मन काबर खावय, तहूँ ह मिलके लूट रे ।। बने मजा हे गरीबहा के, बन के तहूँ ह देख रे । आनी-बानी हवय फायदा, नेतागिरी सरेख रे ।। आँखी रहिके बन ज अंध...
लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान
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रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा। लाइट चली गई
थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल…
3 दिन पहले