अरे दुख पीरा, तैं मोला का डेरूहाबे मैं पर्वत के पथरा जइसे, ठाढ़े रहिहूँव । हाले-डोले बिना, एक जगह माढ़े रहिहूँव जब तैं चारो कोती ले बडोरा बनके आबे अरे दुख पीरा, तैं मोला का ...
कहानी: लंगड़ा कौन? (आपबीती)- डॉ. विनोद कुमार वर्मा
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( 1 ) एक लंगड़ा भिखारी बैसाखी पकड़े हाथ फैलाए खड़ा था। ‘दू रुपिया बाबूजी
….. दू रुपिया …..’ मुझे प्लेटफॉर्म पर पहुँचने की थोड़ी जल्दी थी। ट्रेन आने
का…
1 दिन पहले