धन धन तुलसी दास ला, धन धन ओखर भक्ति ला। रामचरित मानस रचे, कहिस चरित के शक्ति ला ।। मरयादा के डोर मा, बांध रखे हे राम ला । गढ़य चरित मनखे अपन, देख राम के काम ला । जीवन जीये के कला, बांटे तुलसी दास हा । राम बनाये राम ला, मरयादा के परकाश हा ।। रामचरित मानस पढ़व, सोच समझ के लेख लव । कइसे होथे संबंध हा, रामचरित ले देख लव ।। राम राज के सोच हा, कइसे पूरा हो सकत । कोनो न सुधारे चरित, बोलत रहिथें बस फकत ।।
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
7 घंटे पहले