टोकब न भाये (करखा दंडक छंद) काला कहिबे, का अउ कइसे कहिबे, आघू आके, चिन्हउ कहाये । येही डर मा, आँखी-कान ल मूंदे, लोगन कहिथे, टोकब न भाये ।। भले खपत हे, मनखे चारों कोती, बेजा कब्जा, मनभर सकेले । नियम-धियम ला, अपने खुद के इज्जत, धरम-करम ला, घुरवा धकेले ।। -रमेशकुमार सिंह चौहान
लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान
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रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा। लाइट चली गई
थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल…
2 हफ़्ते पहले