नीति के दोहा धरम करम के सार हे, जिये मरे के नेंग । जीयत भर करले करम, नेकी रद्दा रेंग ।। करम तोर पहिचान हे, करम तोर अभिमान । जइसे करबे तैं करम, तइसे पाबे मान ।। करे बुराई आन के, अपनो अवगुण देख । धर्म जाति के आदमी, गलती अपने सरेख ।। पथरा लकड़ी चेंदरा, अउ पोथी गुरू नाम । आस्था के सब बिम्ब हे, माने से हे काम ।। आस्था टोरे आन के, डफली अपन बजाय । तोरो तो कुछु हे कमी, ओला कोन बताय ।। मनखे ला माने कहाँ, मनखे मनखे एक । ऊँच-नीच घिनहा बने, सोच धरे हस टेक ।। बदला ले के भाव ले, ओखी जाथे बाढ़ । भुले-बिसरे भूल के, ओखी झन तैं काढ़ ।। -रमेश चौहान
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले