//करमा गीत// नायक- मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न, तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न । नायिका- मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगेंव न, तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न। नायक- फूल पतिया कस, गाल लाली-लाली... ओठ जइसे मधुरस ले, भरे कोनो थारी नायिका- तोर बहिया पलना, झूलना कस लागे.. तोर मया के पुरवाही, तन-मन मा छागे नायक- मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न, तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न । नायिका- मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगेंव न, तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न तोर मया बदरवा, मैं चिरइया होगेंव न। नायक- फूल कस ममहावय, मुच-मुच हाँसी .... अरझ के रहि जाये, जीयरा करे फासी नायिका- तोर मया के रंग, बदरा कस लागे देखे बर तोला रे, मन म पाखी जागे नायक- मैं भौरा होगेंव ओ....., मैं भौरा होगेंव न, तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न तोर मया ह फूलवा, मन भौरा होगेंव न । नायिका- मैं चिरइया होगेंव गा...., मैं चिरइया होगे...
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
-
विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले