खेले बिजली खेल (कुण्डलियां) चमनी-कंड़िल हे नहीं, नइ हे माटीतेल । अंधियार तो घर परे, खेले बिजली खेल ।। खेले बिजली खेल, कहत मोला छू लेवव । खेलत छू-छूवाल, दॉव मोरे दे देदव ।। धन-धन हवय ‘रमेश’, टार्च मोबाइल ठिमनी ।। घर मा लाइन गोल, नई हे कंडिल-चिमनी ।।
गुल्लक (हिंदी लघुकथा) – डॉ. विनोद कुमार वर्मा
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दस बरस की अंशु की छुट्टियाँ चल रही थी। आज शुक्रवार का दिन था।
महीने का आखिरी तारीख भी। पापा आफिस जाने के लिए निकल ही रहे थे कि…
4 दिन पहले