सबो चीज के अपने गुण धर्म, एक पहिचान ओखरे होथे । कोनो पातर कोनो रोठ, पोठ कोनो हा गुजगुज होथे । कोनो सिठ्ठा कोनो मीठ, करू कानो हा चुरपुर होथे । धरम-करम के येही मर्म, धर्म अपने तो अपने होथे ।। सबो चीज के अपने गुण दोश, दोष भर कोनो काबर देखे । गुण दूसर के तैंहर देख, दोष ला अपने रखत समेखे ।। मनखे के मनखेपन धर्म, सबो मनखे ला एके जाने । जीव दया ला अंतस राख, सबो प्राणी ला एके माने ।। -रमेशकुमार सिंह चौहान
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले