रविवार, 1 सितंबर 2019

हे गणपति गणराज प्रभु

हे गणपति गणराज प्रभु, हे गजबदन गणेश,
श्रद्धा अउ विश्वास के, लाये भेंट ‘रमेश‘ ।।
लाये भेंट ‘रमेश‘, पहिलि तोला परघावत ।
पाँव गिरे मुड-गोड़, अपन दुख दरद सुनावत ।
दुख मा फँसे ‘रमेश’, विनति सुनलव हे जगपति ।
विघ्न विनाशक आच, विघ्न मेटव हे गणपति ।।

सोमवार, 22 जुलाई 2019

सावन

सावन तैं करिया बिलवा हस,
तैं छलिया जस कृष्ण मुरारी ।
जोहत-जोहत रोवत हावँव,
आत नई हस  मोर दुवारी ।।
बूँद कहां तरिया नरवा कुछु
बोर कुवाँ नल हे दुखियारी ।
बावत धान जरे धनहा अब
रोय किसान धरे मुड़ भारी ।।

पीयब धोब-नहावब के अब
संकट ले बड़ संकट भारी ।
बोर अटावत खेत सुखावत
ले कइसे अब जी बनवारी ।
आवव-आवव बादर सावन
संकट जीवन मा बड़ भारी ।।
देर कहूँ अब तैं करबे तब।
जीयत बाचब ना जग झारी ।।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

चलना खेले ला जाबो रे

चल ना रे खेले ला जाबो  ।
अबे मजा अब्बड़ के पाबो ।।
का राखे ये मोबाइल मा ।
बइठे-बइठे  ये स्टाइल मा ।।

नदिया जाबो तरिया जाबो ।
कूद-कूद के खूब नहाबो ।।
रेसटीप हम डूबे-डूबे ।
बने खेलबो हमन ह खूबे ।।
ढेस पोखरा खोज-खोज के ।
खाबो अब्बड़ रोज-रोज के ।।
का राखे ये मोबाइल मा ।
बइठे-बइठे  ये स्टाइल मा ।।

गिल्ली-डंडा चल धर ना बे ।
टोड़ी मारत पादी पाबे ।।
खट-उल मा कोनो हा चलही ।
खेले बर जब मन ह मचलही ।।
खोर-गली दइहान चली हम ।
लइकापन के डार चढ़ी हम ।।
का राखे ये मोबाइल मा ।
बइठे-बइठे  ये स्टाइल मा ।।

शुक्रवार, 28 जून 2019

गणित बनाये के नियम

गणित बनाये के नियम, धर लौ थोकिन ध्यान ।
जोड़ घटाना सीख के, गुणा भाग ला जान ।।
गुणा भाग ला जान, गणित के प्राण बरोबर ।
एक संग जब देख, चिन्ह ला सबो सरोबर ।।
कोष्टक पहिली खोल, फेर "का" जेन तनाये ।
भाग गुणा तब जोड़, घटा के गणित बनाये ।।

-रमेश चौहान

शनिवार, 22 जून 2019

सास बहू के झगरा

आँखी तोरे फूट गे, दिखत नई हे काम ।
गोबर-कचरा छोड़ के, करत हवस आराम ।।
करत हवस आ-राम दोखई, बइठे-बइठे ।
सुनत सास के, गारी-गल्ला, बहू ह अइठे ।।
नई करँव जा, का करबे कर, मरजी मोरे ।
बइठे रहिहँव, चाहे फूटय, आँखी तोरे ।।


गुरुवार, 16 मई 2019

छोड़ दारु के फेशन

छोड़ दारु के फेशन, हे बड़ नुकसान ।
फेशन के चक्कर मा, हस तैं अनजान ।।

नशा नाश के जड़ हे, तन मन ला खाय ।
कोन नई जानय ये, हे सब भरमाय ।।

दारु नशा ले जादा, फेशन हे आज ।
पढ़े-लिखे अनपढ़ बन, करथे ये काज।।

कोन धनी अउ निर्धन, सब एके हाल ।
मनखे-मनखे चलथे, दरुहा के चाल ।।

नीत-रीत देखे मा, दोषी सरकार ।
चाल-चलन मनखे के, रखय न दरकार ।।

-रमेश चौहान

देवनागरी मा लिखव

जनम भूमि अउ जननी, सरग जइसे ।
जननी भाखा-बोली, नरक कइसे ।।

छत्तीसगढ़ी हिन्दी, लाज मरथे ।
जब अंग्रेजी भाखा, मुड़ी चढ़थे ।।

देवनागरी लिपि के, मान कर लौ ।
तज के रोमन झांसा, मया भर लौ ।।

कबतक सहत गुलामी, हमन रहिबो ।
कबतक दूसर भाखा, हमन कहिबो ।।

देवनागरी मा लिख, हिम्मत करे ।
कठिन कहत रे येला, दिल नइ जरे ।।

दुनिया देवय झासा, कठिन कहिके ।
तहूँ मगन हस येमा, मुड़ी सहिके ।।

-रमेश चौहान