शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

छंद चालीसा

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

तर्क ज्ञान विज्ञान कसौटी

तर्क ज्ञान विज्ञान कसौटी, पढ़ई-लिखई के जर आवय ।
काबर कइसे प्रश्न खड़ा हो, जिज्ञासा ला हमर बढ़ावय ।।
रटे-रूटाये तोता जइसे, अक्कल ला ठेंगा देखावय ।
डिग्री-डिग्री के पोथा धर के, ज्ञानी-मानी खुदे कहावय ।।

जिहां तर्क के जरूरत होथे, फांदे ना अक्कल के नांगर ।
आस्था ला टोरे-भांजे बर, अपन चलावत रहिथे जांगर ।।
ज्ञान परे आखर पोथी ले, कतको अनपढ़ ज्ञानी हावय ।
सृष्टि नियम विज्ञान खोजथे, ललक-सनक ला जेने भावय ।।

सुख बीजा विज्ञान खोचथे, भौतिक सुविधा ला सिरजावय ।
खुद करके देखय अउ जानय, वोही हा विज्ञान कहावय ।।
सृष्टि रीत जे जानय मानय, मानवता जे हर अपनावय ।
अंतस सुख के जे बीजा बोवय, वो ज्ञानी आदमी कहावय ।।

एक ध्येय ज्ञानी विज्ञानी के, मनखे जीवन डगर बहारय ।
एक लक्ष्य अध्यात्म धर्म के, मनखे मन के सोच सवारय ।।
अपन सुवारथ लाग-लपेटा, फेर कहां ले मनखे पावय ।
अपने घर परिवार बिसारे, अपने भर ला कइसे भावय ।। 

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

खून पसीना मा झगरा हे

खून पसीना मा झगरा हे,
परे जगत के फेर

बने-बुनाये सड़क एक बर,
सरपट-सरपट दउड़े ।
एक पैयडगरी गढ़त हवे
अपन भाग ला डउडे़ ।। (डउड़ना-सवारना)

केवल अधिकार एक जानय,
एक करम के टेर

जेन खून के जाये होथे,
ओखर चस्मा हरियर ।
जेन पसीना ला बोहाथे,
ओखर मन हा फरियर ।।

एक धरे हे सोना चांदी,
दूसर कासा नेर ।।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

बरखा ला फोन करे हे

नवगीत
मोर गांव के धनहा-डोली,
बरखा ला फोन करे हे ।
तोर ठिठोली देखत-देखत,
छाती हा मोर जरे हे ।।

रोंवा-रोंवा पथरा होगे,
परवत होगे काया ।
पानी-माटी के तन हा मोरे
समझय कइसे माया

धान-पान के बाढ़त बिरवा,
मुरछा खाय परे हे

एको लोटा पानी भेजव,
मुँह म छिटा मारे बर
कोरा के लइका चिहरत हे,
येला पुचकारे बर

अब जिनगी के भार भरोसा
ऊपर तोर धरे हे

फूदक-फुदक के गाही गाना,
तोर दरस ला पाके
घेरी-घेरी माथ नवाही
तोर पाँव मा जाके

कतका दिन के बिसरे हावस
सुन्ना इहां परे हे ।

सोमवार, 27 नवंबर 2017

करम बड़े के भाग

फांदा मा चिरई फसे, काखर हावे दोष ।
भूख मिटाये के करम, या किस्मत के रोष ।।
या किस्मत के रोष, काल बनके हे आये ।
करम बड़े के भाग, समझ मोला कुछु ना आये ।।
सोचत हवे ‘रमेश‘, अरझ दुनिया के थांघा ।
काखर हावे दोष, फसे चिरई हा फांदा ।।

पहा जथे हर रात, पहाती बेरा देखत

देखत कारी रात ला, मन मा आथे सोच ।
कुलुप अंधियारी हवय, खाही हमला नोच ।
खाही हमला नोच, हमन बाचन नहिं अब रे ।
पता नही भगवान, रात ये कटही कब रे ।।
धर ले गोठ ‘रमेश‘, अपन मन ला तैं सेकत ।
पहा जथे हर रात, पहाती बेरा देखत ।

लंबा लबरा जीभ

खाये भर बर तो हस नही, लंबा लबरा जीभ ।
बोली बतरस मा घला, गुरतुर-गुरतुर नीभ ।।
गुरतुर-गुरतुर नीभ, स्वाद दूनों तैं जाने ।
करू-करू के मीठ,  बने कोने ला तैं माने ।।
पूछत हवय ‘रमेश‘,  मजा कामा तैं पाये ।
गुरतुर बोली छोड़, मीठ कतका तैं खाये ।।