शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सहे अत्याचार (रूपमाला छंद)

शत्रु मारे देश के तैं, लांघ सीमा पार ।
हमर ताकत हवय कतका, जानगे संसार ।।

नोटबंदी झेल जनता, खड़े रहिगे संग ।
देश बर हे मया कतका, शत्रु देखे दंग ।।

हमर सैनिक हमर धरती, हमर ये पहिचान ।
मान अउ सम्मान इंखर, हमर तैं हा जान ।

झेल पथरा शत्रु के तै, सहे अत्याचार ।
हमर सैनिक मार खावय, बने तै लाचार ।।

फैसला तैं खूब लेथस, मौन काबर आज ।
सहत हस अपमान काबर, हवय तोरे राज ।।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

चना होरा कस, लइकापन लेसागे

चना होरा कस,
लइकापन लेसागे

पेट भीतर लइका के संचरे
ओखर बर कोठा खोजत हे,
पढ़ई-लिखई के चोचला धर
स्कूल-हास्टल म बोजत हे

देखा-देखी के चलन
दाई-ददा बउरागे

सुत उठ के बड़े बिहनिया
स्कूल मोटर म बइठे
बेरा बुड़ती घर पहुॅचे लइका
भूख-पियास म अइठे

अंग्रेजी चलन के दौरी म
लइका मन मिंजागे

बारो महिना चौबीस घंटा
लइका के पाछू परे हे
खाना-पीना खेल-कूद सब
अंग्रेजी पुस्तक म भरे हे

पीठ म लदका के परे
बछवा ह बइला कहागे

चिरई-चिरगुन, नदिया-नरवा
अउ गाँव के मनखे
लइका केवल फोटू म देखे
सउहे देखे न तनके

अपने गाँव के जनमे लइका
सगा-पहुना कस लागे

साहेब-सुहबा, डॉक्टर-मास्टर
हो जाही मोर लइका
जइसने बड़का नौकरी होही
तइसने रौबदारी के फइका

पुस्तक के किरा बिलबिलावत
देष-राज म समागे

बंद कमरा म बइठे-बइठे साहब
योजना अपने गढ़थे
घाम-पसीना जीयत भर न जाने
पसीना के रंग भरथे

भुईंया के चिखला जाने न जेन
सहेब बन के आगे


बुधवार, 5 अप्रैल 2017

मूरख हमला बनावत हें

बॉट-बॉट के फोकट म
मूरख हमला बनावत हे

पढ़े-लिखे नोनी-बाबू के,
गाँव-गाँव म बाढ़ हे
काम-बुता लइका मन खोजय
येखर कहां जुगाड़ हे

बेरोजगारी भत्ता बॉट-बॉट
वाहवाही तो पावत हे

गली-गली हर गाँव के
बेजाकब्जा म छेकाय हे
गली-गली के नाली हा
लद्दी म बजबजाय हे

छत्तीगढ़िया सबले बढ़िया
गाना हमला सुनावत हे

जात-पात म बाँट-बाँट के
बनवात हे सामाजिक भवन
गली-खोर उबड़-खाबड़
गाँव के पीरा काला कहन

सपना देखा-देखा के
वोट बैंक बनावत हे

मास्टर पढ़ाई के छोड़
बाकी सबो बुता करत हे
हमर लइका घात होषियार
आघूच-आघूच बढ़त हे

दिमाग देहे बर लइका मन ला
थारी भर भात खवावत हे

गाँव म डॉक्टर बिन मनखे
बीमारी मा मरत हे
कोरट के पेशी के जोहा म
हमर केस सरत हे

करमचारी के अतका कमी
अपने स्टाफ बढ़ावत हे

महिला कमाण्ड़ो घूम-घूम
दरूवहा मन ला डरूवावय
गाँव के बिगड़े शांति ल
लाठी धर के मनावय

जनता के पुलिस ला धर
वो हा दारू बेचवावत हे

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

चारो कोती ले मरना हे

झोला छाप गांव के डॉक्टर, अउ रद्दा के भठ्ठी  ।
करना हावे बंद सबो ला, कोरट दे हे पट्टी ।।

क्लिनिक सील होगे डॉक्टर के, लागे हावे तारा ।
सड़क तीर के भठ्ठी बाचे, न्याय तंत्र हे न्यारा ।।

सरदी बुखार हमला हावय , डॉक्टर एक न गाँव म ।
लू गरमी के लगे थिरा ले, तैं भठ्ठी के छाँव म।।

हमर गाँव के डॉक्टर लइका, शहर म जाके रहिथे ।
नान्हे-नान्हे लइका-बच्चा, दरूहा ददा ल सहिथे ।।

गरीबहा भगवान भरोसा, सेठ मनन सरकारी ।
चारो कोती ले मरना हे, अइसन हे बीमारी ।।

रविवार, 2 अप्रैल 2017

अब आघू बढ़ही, छत्तीसगढ़ी

अब आघू बढ़ही, छत्तीसगढ़ी, अइसे तो लागत हे ।
बहुत करमचारी, अउ अधिकारी, येला तो बाखत हे ।।
फेरे अपने मन, लाठी कस तन, खिचरी ला रांधत  हे ।
आके झासा मा, ये भाषा मा, आने ला सांधत हें ।।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

मदिरा सवैया

रूप न रंग न नाम हवे कुछु, फेर बसे हर रंग म हे ।
रूप बने न कभू बिन ओखर, ओ सबके संग म हे ।।
नाम अनेक भले कहिथे जग, ईश्वर फेर अनाम हवे ।
केवल मंदिर मस्जिद मा नहि, ओ हर तो हर धाम हवे ।।