जात-धरम, सबके हे, दुनिया के जीव मा । रंग-रूप, अलग-अलग, सब निर्जीव मा ।। जोड़ रखे, अपन धरम, धरती बर एक हो । देश एक, अपने कर, मनखे तैं नेक हो ।।
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 हफ़्ते पहले