म या करले (सुगती छंद) मया करले । मन म भरले तोर हॅव मैं । मोर हस तैं तोर हॅसना । मोर फॅसना मोर हॅसना । तोर फॅसना करे बइहा । मया दइहा अलग रहिबे । दुख ल सहिबे संग रहिबो । सब ल सहिबो हमन तनके । रहब मनके आव अॅगना । पहिर कॅंगना नाम धरके । मांघ भरके -रमेश चौहान
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले