घनाक्षरी लिपे-पोते घर-द्वार, झांड़े-पोछे अंगना चुक-चुक ले दिखय, रंगोली खोर के । नवा-नवा जिंस-पेंट, नवा लइका पहिरे, उज्जर दिखे जइसे, सूरुज ए भोर के ।। रिगबिग-रिगबिग, खोर-गली घर-द्वार रिगबिग दीया-बाती, सुरुज अंजोर के । मन भीतर अपन, तैं ह संगी अब तो, रिगबिग दीया बार, मया प्रीत घाेेर के ।।
कहिनी:पानी हे अमोल -डोरेलाल कैवर्त
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“‘ बिन पानी नि हे जिनगानी* ” ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी
जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन…
3 हफ़्ते पहले