सार छंद कोरोना के कहर देख के, डर हमला लागे । गाँव-गाँव अउ शहर-शहर मा, कोराना हा छागे ।। सब ला एके दिन मरना हे, नहीं मरब ले डर गा । फेर मरे के पाछू मरना, मन काँपे थर-थर गा काठी-माटी हा बिगड़त हे, कोनो तीर न जावय । पिण्डा-पानी के का कहिबे, कपाल क्रिया न पावय ।। धरम-करम हे जियत-मरत के, काला कोन बतावय । अब अंतिम संस्कार करे के, कइसे धरम निभावय ।। कभू-कभू तो गुस्सा आथे, शंका मन उपजाथे । बीमारी के करे बहाना, बैरी हा डरूवाथे ।। बीमरहा हे जे पहिली ले, ओही हर तो जाथे । बने पोठलगहा मनखे मन, येला मार भगाथे । हमरे संस्कार रहय जींदा, मरे म घला सुहाथे ।। -रमेश चैहान
लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान
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रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा। लाइट चली गई
थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल…
1 हफ़्ते पहले