--मंजुतिलका छंद-- जागव जागव हिन्दू, रहव न उदास । देश हवय तुहरे ले, करव विश्वास ।। जतन देश के करना, धर्म हे नेक । ऊँच नीच ला छोड़व, रहव सब एक ।। अलग अपन ला काबर, करत हस आज । झेल सबो के सहिबो, तब ना समाज ।। काली के ओ गलती, लेबो सुधार । जोत एकता के धर, छोड़व उधार ।। --अरूण छंद-- देश बर, काम कर, छोड़ अभिमान ला । जात के, पात के, मेट अपमान ला ।। एक हो, नेक हो, गलती सुधार के । मिल गला, कर भला, गलती बिसार के ।। ऊँच के, नीच के, आखर उखाड़ दौ । हाथ दौ, साथ दौं, परती उजाड़ दौ ।। हाथ के, गोड़ के, मेल ले देह हे । ऐहु मा, ओहु मा, बने जब नेह हे ।।
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले