पहिली मुरकेटव, इखर टोटा (द्वितीय झूलना दंडक छंद) एक खड़े बाहिर, एक अड़े भीतर, बैरी दूनों हे, देष के गा । बाहिर ले जादा, भीतर के बैरी, बैरी ले बैरी, देष के गा ।। बाहिर ला छोड़व, भीतर ला देखव, पहिली मुरकेटव, इखर टोटा । बाहिर के का हे, भीतर ला देखत, पटाटोर जाही, धरत लोटा ।। -रमेशकुमार सिंह चौहान
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
7 घंटे पहले