सस्ता मा समान बेच, लालच देखावत हे, हम बिसावत हन के, हमला बिसावत हे । धरे हन मोबाइल, चाइना हम हाथ मा, ओही मोबाइल बीच, चीन डेरूवावत हे । बात-बात मा चाइना, हर काम मा चाइना सस्ता के ये चक्कर ह, चक्कर बनावत हे । सस्ता के ये चक्कर म, अपनेे ला झन बेच अपनो ल देख संगी, तोला ओ बिगाड़त हे ।
कहानी: लंगड़ा कौन? (आपबीती)- डॉ. विनोद कुमार वर्मा
-
( 1 ) एक लंगड़ा भिखारी बैसाखी पकड़े हाथ फैलाए खड़ा था। ‘दू रुपिया बाबूजी
….. दू रुपिया …..’ मुझे प्लेटफॉर्म पर पहुँचने की थोड़ी जल्दी थी। ट्रेन आने
का…
1 दिन पहले