अव्यवस्था के खिलाफ बियंग भरे सरसी छंद चित्र गुगल से साभार दू पइसा मा मँहगा होगे, गउ माता हा आज रे । कुकरी-कुकरा संग बोकरा, करत हवय अब राज रे। बइला के पूछारी नइ हे, भइसा ला झन पूछ रे । आनी बानी के मषीन मा, अब देखावय सूझ रे ।। सरकारी जमीन खाली हे, जाके ओला छेक रे । आज नहीं ता काली तोला, पट्टा मिलही नेक रे ।। कोला-बारी खेत बना ले, नदिया नरवा पाट रे। घर कुरिया अउ महल बना ले, छेकत रद्दा बाट रे।। सरकार नगत के डर्राथे, तोर हाथ मा वोट रे । मन भर ऊदा-बादी करले, कोने देही चोट रे ।। मनभर करजा कर ले तैं हा, होबे करही छूट रे । नेता भर मन काबर खावय, तहूँ ह मिलके लूट रे ।। बने मजा हे गरीबहा के, बन के तहूँ ह देख रे । आनी-बानी हवय फायदा, नेतागिरी सरेख रे ।। आँखी रहिके बन ज अंध...
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
2 दिन पहले