मिलत हवय ना हमर गांव मा, अब बनिहार गा । कहँव कोन ला सुझत न कूछु हे, सब सुखियार गा ।। दिखय न अधिया लेवइया अब, धरय न रेगहा । अइसइ दिन मा हमर किसानी, बनय न थेगहा ।।
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
1 हफ़्ते पहले