जनम भूमि अउ जननी, सरग जइसे । जननी भाखा-बोली, नरक कइसे ।। छत्तीसगढ़ी हिन्दी, लाज मरथे । जब अंग्रेजी भाखा, मुड़ी चढ़थे ।। देवनागरी लिपि के, मान कर लौ । तज के रोमन झांसा, मया भर लौ ।। कबतक सहत गुलामी, हमन रहिबो । कबतक दूसर भाखा, हमन कहिबो ।। देवनागरी मा लिख, हिम्मत करे । कठिन कहत रे येला, दिल नइ जरे ।। दुनिया देवय झासा, कठिन कहिके । तहूँ मगन हस येमा, मुड़ी सहिके ।। -रमेश चौहान
लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान
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रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा। लाइट चली गई
थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल…
1 हफ़्ते पहले