जनम भूमि अउ जननी, सरग जइसे । जननी भाखा-बोली, नरक कइसे ।। छत्तीसगढ़ी हिन्दी, लाज मरथे । जब अंग्रेजी भाखा, मुड़ी चढ़थे ।। देवनागरी लिपि के, मान कर लौ । तज के रोमन झांसा, मया भर लौ ।। कबतक सहत गुलामी, हमन रहिबो । कबतक दूसर भाखा, हमन कहिबो ।। देवनागरी मा लिख, हिम्मत करे । कठिन कहत रे येला, दिल नइ जरे ।। दुनिया देवय झासा, कठिन कहिके । तहूँ मगन हस येमा, मुड़ी सहिके ।। -रमेश चौहान
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले