हर जात ले, हर धर्म ले, आघू खड़े, ये देश । हे मोर ले, अउ तोर ले, बड़का बड़े, ये देश ।। सम्मान कर, अभिमान कर, तैं भुला के, खुद क्लेष । ये मान ले, अउ जान ले, हे तोर तो, ये देश ।। विरोध करव, सरकार के, जनतंत्र मा, हे छूट । पर देश के, तै शत्रु बन, सम्मान ला, झन लूट ।। पहिचान हे, अभिमान हे, हमर सैनिक, हे वीर । अपन धरती, अउ देश बर, डटे रहिथे, धर धीर ।। -रमेश चौहान
कहिनी:पानी हे अमोल -डोरेलाल कैवर्त
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“‘ बिन पानी नि हे जिनगानी* ” ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी
जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन…
4 हफ़्ते पहले