देखा-देखी, अनदेखी सब जानथे । जी ले जांगर, बरपेली सब तानथे ।। होके मनखे, चलत हवे जस भेड़िया । मे-मे दिनभर, नरियाथे जस छेरिया । अंग्रेजी के, बोली-बतरस बोलथें । छत्तीसगढ़ी, हिन्दी ला बड़ ठोलथें ।। इज्जत अपने, अपन हाथ धर खोत हें । का अब कहिबे, काँटा ला खुद बोत हें ।। गाँव देश के, गलती केवल देखथें । बैरी बानिक, आँखी निटोर सेकथें ।। दूसर सुधरय, इच्छा सबझन राखथें । गोठ अपन के, अधरे अधर म फाँकथें ।। चाट-चाट के, खावय दूसर के जुठा । झूठ-मूठ के, शान-शौकत धरे मुठा ।। जागव-जागव, देखव-देखव गाँव ला । स्वाभिमान के, अपने सुग्घर छाँव ला ।। आज सुधरबो, भूल-चूक सब छोड़ के । बंधे खूँटा, सकरी-साकर तोड़ के । देश गाँव के, रहन-सहन सब पोठ हे । गाँठ बाँधबो, येही सिरतुन गोठ हे ं।।
लघु कथा: क्या भूत होते हैं?-रमेश चौहान
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रामाधार के पोते चिंटू ने पहली बार ये सवाल रात के दस बजे पूछा। लाइट चली गई
थी। सुमित्रा रसोई में ढिबरी जला रही थी। बाहर बँसवारी में हवा चल…
2 हफ़्ते पहले