बुता काम बिना दाम, मिलय नही ये दुनिया । लिखे पढ़े जेन कढ़े, ओही तो हे गुनिया ।। बने पढ़व बने कढ़व, शान-मान यदि चाही । पूछ परख तोर सरख, होही जब कुछु आही ।
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
1 हफ़्ते पहले