समय हृदय के साफ, दुवाभेदी ना जानय । चाल-ढाल रख एक, सबो ला एके मानय । पानी रहय न लोट, कमल पतरी मा जइसे । ओला होय न भान, हवय सुख-दुख हा कइसे । ओही बेरा एक, जनम कोनो तो लेथे । मरके कोनो एक, सगा ला पीरा देथे ।। अपन करम के भोग, भोगथे मनखे मनखे । कोनो बइठे रोय, हाँसथे कोनो तनके ।।
एक राजर्षि की मूर्त कल्पना है शाहजहांपुर की पब्लिक लाइब्रेरी-प्रो रवीन्द्र
प्रताप सिंह
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तकनीकी क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ डिजिटल माध्यमों पर सिमटता जा रहा है,
तब भी किताबों का आकर्षण और महत्व कम नहीं हुआ है। किताबें केवल शब्दों…
4 हफ़्ते पहले