आगी झन बारँव इहाँ, इहाँ सरग के ठाँव । छत्तीसगढ़ नाम हवय, सरग दुवारी छाँव ।। सरग दुवारी, छाँव निहारत, दुनिया आथे । आथे जेने, इही ठउर मा, बड़ सुख पाथे । हमरे माटी, चुपरय छाती, कहि पालागी । अपन पराया, कहि कहि के झन, बारँव आगी ।।
पुरु–उर्वशी संवाद:विरह में रचा जीवन-आदर्श उज्जवल उपाध्याय
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वाक्यों, विचार, भावुकता पर नेत्रों पर और सरलता पर, देवत्व तिरस्कृत कर उस
दिन उर्वशी मुग्ध थी नरता पर, अप्सरा स्वर्ग की, नारी बन पृथ्वी के दुख सुख
सहने ...
1 हफ़्ते पहले