भृंग छंद नगण (111) 6 बार अंत म पताका (21) चल न घर ग, बिफर मत न, चढ़त हवय दारू । कहत कहत, थकत हवय, लगत हवय भारू ।। लहुट-पहुट, जतर-कतर, करत हवस आज । सुनत-सुनत, बकर-बकर, लगत हवय लाज ।।
कहिनी:पानी हे अमोल -डोरेलाल कैवर्त
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“‘ बिन पानी नि हे जिनगानी* ” ए कहना सोलाआना सिरतोन आय । पानी के बिना जिनगी
जिए के कल्पना घलो नि करे जा सके ? हमन सबो जानत हांवन…
5 हफ़्ते पहले