बुधवार, 23 नवंबर 2016

//घर-घर के दीया बन जाबे//

श्री हरिवंशराय बच्चन के 1955 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘प्रणय पत्रिका‘ में प्रकाशित कविता ‘मेरे अंतर की ज्वाला तुम घर-घर दीप शिखा बन जाओ‘ का छत्तीसगढ़ी अनुवाद-

//घर-घर के दीया बन जाबे//

मोर मन के दहकत आगी, घर-घर के दीया बन जाबे ।
मोर मन के दहकत आगी, घर-घर के दीया बन जाबे ।।

सुरूज करेजा मा अंगार धरे
सात रंग बरसाथे धरती म ।
समुन्दर नुनछुर पानी पी के
अमरित बरसाथे धरती म ।।

घाव छाती म धरती सहिके
महर-महर ममहाथे फूल म....

अपन जात धरम मरजाद, रे मन दुख मा भुला झन जाबे ।
मोर मन के दहकत आगी, घर-घर के दीया बन जाबे ।।

पुण्य हा जमा होथे जब
आगी करेजा मा लगथे ।
येखर मरम जाने ओही
जेखर काया ये सुलगथे ।।

अंतस भरे रखथे जेन हा
बनथे राख-धुंआ कचरा ...

बाहिर निकल नाचथे-गाथे, ताव सकेल परकाश बन जाबे ।
मोर मन के दहकत आगी, घर-घर के दीया बन जाबे ।।


अनुवादक-रमेश चौहान
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मूल रचना-

‘मेरे अंतर की ज्वाला तुम घर-घर दीप शिखा बन जाओ‘

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

रद्दा जोहत हे तोरे

शोभान-सिंहिका
गाड़ी बने चलावव गा, चारो डहर देख ।
डेरी बाजू रहे रहव, छोड़व मीन-मेख ।।
दारु मंद पीयव मत तुम, हेंडिल धरे हाथ ।
ओवरटेक करव मत गा, तुम कोखरो साथ ।।

जीवन अनमोल हे, येखर समझ मोल ।
हाथ-पाँव तब सड़क थरव, मन मा नाप-तोल ।
फिरना हे अपने घर मा, चारो खूट घूम ।
रद्दा जोहत हे तोरे, लइका करत धूम ।

-रमेश चौहान

सड़क पैयडगरी दुनो (नवगीत)

सड़क पैयडगरी दुनो
गोठ करत हें आज

लाखों मोटर-गाड़ी मनखे
आके मोर दुवारी
सुनव पैयडगरी, करत हवँय
दिन भर तोरे चारी

सड़क मुछा मा ताव दे
करत हवय बड़ नाज

मुच-मुच मुस्काय पैयडगरी
सुन-सुन गोठ लमेरा
आँखी रहिके अंधरा हवय
बनके तोरे चेरा
(चेरा-चेला)

मनखे-मनखे के मुड़ म
कोन गिराथे गाज

मोर दोष कहां हवय येमा
अपने अपन म जाथें
आघू-पाछू देखय नहि अउ
आँखी मूंद झपाथें

मखमल के गद्दा धरे
डारे हंव मैं साज

करिया हे रूप-रंग तोरे
करिया धुँआ पियाथस
चिर-चिर मनखे के तैं छाती
अपन ल बने बताथस

कहय हवा पानी सबो
आय न तोला लाज

पटर-पटर करत हवस तैं हा
अपन ल नई बताये
रेंगा-रेंगा के मनखे ला
तैं हा बहुत थकाये

दर्रा भरका के फुटे
काखर करे लिहाज

महर-महर पुरवाही धरके
अपन संग रेंगाथंव
देह-पान बने रहय उन्खर
अइसन मन सिरजाथंव

हाथ-गोड़ मनखे धरे
करंय थोरको काज

सोमवार, 21 नवंबर 2016

बिना मौत के मौत हा

बिना मौत के मौत हा
करथे समधी भेट

गोल सुरूज के चक्कर काटत
हवय ब्याकुल धरती
चन्दा चक्कर काटत हावे
कहां हवय गा झरती

चक्कर खावय जीव हा
येखर फसे चपेट

मांजे धोय म धोवावय नहि
भड़वा बरतन करिया
नवा-नवा चेंदरा आज के
दूसर दिन बर फरिया

घानी के बइला हमन
कहां भरे हे पेट

कभू आतंकी बैरी मारय
कभू रेलगाड़ी हा
कभू फीस अस्पताल के अउ
कभू डहे ताड़ी हा

काखर ले हम का कही
बंद पड़े हे नेट

चलन काल के जुन्ना होगे

कांव-कांव
कउंवा करे,
अँगना आही कोन

छोड़ अलाली रतिहा भर के
बेरा हा जागे हे
लाल-लाल आगी के गोला
उत्ती मा छागे हे

चम्चम ले
चमकत हवय
जइसे पीयर सोन

करिया नकली नंदा जाही
उज्जर के अब आये
मनखे-मनखे के तन-मन मा
अइसे आसा छाये

देखव
आँखी खोल के
चुप्पा बइठे कोन

चलन काल के जुन्ना होगे
खड़े नवा बर जोहे
नवा गुलाबी नोट मिले हे
सबके मन ला मोहे

मन हा
टूटे कोखरो
बदले जब ये टोन

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

नेता के चरित्र,

नेता के चरित्र, होवय पवित्र, मनखे सबो कहत हे ।
जनता पुच्छला, हल्ला-गुल्ला, उन्खर रोज सहत हे ।।
ओमन चिल्लाथे,देश लजाथे, देख-देख झगरा ला ।
हमर नाम लाथे, अपन बताथे, देखव ओ लबरा ला ।।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

जुन्ना नोट बंद होगे

सखी छंद (14 मात्रा के चार चरण दो पद पदांत 122)

जुन्ना नोट बंद होगे । नवा नोट बर सब भोगे
खड़े हवय बेंक दुवारी । जोहत सबो अपन बारी

हाथे मा नोट कहां हे । हमरे मन खोट कहां हे
बड़का नोट बंद होगे । छोटे नोट चंद होगे

कोनो हा दै न उधारी । मैं बोलव नहीं लबारी
नान-मून काम परे हे । साँय-साँय जेब करे हे

जतका हवय नोट जाली । हो जाही गा सब खाली
ओखर कुबड़ टूटही गा । करिया मरकी फूटही गा

कहूँ-कहूँ नोट बरे हे । कहूँ-कहूँ नोट सरे हे
कोनो फेकत  कचरा मा । कोनो गाड़े डबरा मा

आतंकी के धन कौड़ी । कामा लेही अब लौड़ी
रोवय सब चोर उचक्का । परे हवय अइसन धक्का

मान देश के करबो गा । अपने इज्जत गढ़बो गा
पीरा ला हम सहिबो गा । भारत माता कहिबो गा

रिगबिग ले अँगना मा

हाँसत हे जीया, बारे दीया, रिगबिग ले अँगना मा ।
मिटय अंधियारी, हे उजियारी, रिगबिग ले अँगना मा ।।
गढ़ के रंगोली, नोनी भोली, कइसन के हाँसत हे ।
ले हाथ फटाका, फोर चटाका, लइका हा नाचत हे ।।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

डूब मया के दहरा

पैरी चुप हे साटी चुप हे, मुक्का हे करधनिया ।
चूरी चुप हे झुमका चुप हे, बोलय नही सजनिया ।।

दग-दग ले उज्जर तरपौरी,  चुक-चुक ले हे एड़ी ।
बिरबिट-बिरबिट लाल महुर के, तोड़े हावे बेड़ी ।।
घुठुवा बैरी पैरी छोड़े, रेषम डोरी बांधे ।
छोटे-छोटे चुन्दी राखे, केष घटा ना छांदे ।।
सोलह अँग ले आरूग हावय, जइसे नवा बिहनिया

आंखी ले तो भाखा फूटय, जस सागर के लहरा ।
उबुक-चुबुक करय मोर आंखी, डूब मया के दहरा ।।
लाख चॅंदैनी बादर होथे, तभो कुलुप अॅधियारे ।
चंदा एक सरग ले निकलय, जीव म जीव ल डारे ।।
जोही बर के छांव जनाथे, जिनगी के मझनिया

बुधवार, 9 नवंबर 2016

मोर कलम शंकर बन जाही

पी के तोर पीरा
मोर कलम
शंकर बन जाही

तोर आँखी के आँसू
दवाद मा भर के
छलकत दरद ला
नीप-जीप कर के

सोखता कागज मा
मनखे मन के
अपन स्याही छलकाही

तर-तर तर-तर पसीना तैं
दिन भर बोहावस
बिता भर पेट ला धरे
कौरा भर नई खावस

भूख के अंगरा मा
अंगाकर बन
ये कड़कड़ ले सेकाही

डोकरा के हाथ के लाठी
बेटी के मन के पाखी
चोर उचक्का के आघू
दे के गवाही साखी

आँखी मूंदे खड़े
कानून ला
रद्दा देखाही

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

दोहा के रंग pdf

‘‘ आँखी रहिके अंधरा‘ pdf

आँख रहिके अंधरा

दिनांक 3 अप्रैल 2016 के मुगेली मा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष डॉ. विनय पाठक के शुभ हाथ ले मोर छत्तीसगढ़ी दूसर पुस्तक ‘‘ आँखी रहिके अंधरा‘ (कुण्डलियां छंद के कोठी ) के विमोचन होइस ।
‘आँखी रहिके अंधरा‘

बुधवार, 2 नवंबर 2016

ऊही ठउर ह घर कहाथे (नवगीत)

झरर-झरर चलत रहिथे
जिहां मया के पुरवाही
ऊही ठउर ह घर कहाथे

ओदरे भले हे छबना
फुटहा भिथिया के
लाज ला ढाके हे
परदा रहेटिया के

लइका खेलत रहिथे
मारत किलकारी
ओही अँगना गजब सुहाथे
अपन मुँह के कौरा ला
लइका ला खवावय
अपन कुरथा ला छोड़
ओखर बर जिन्स लावय

पाई-पाई जोरे बर
जांगर ला पेर-पेर
ददा पसीना मा नहाथे

अभी-अभी खेत ले
कमा के आये हे बहू
ताकत रहिस बेटवा
अब चुहकत हे लहू

लांघन-भूखन सहिथे
लइका ला पीयाय बिन
दाई हा खुदे कहां खाथे

माटी, ईटा-पथरा के
पोर-पोर मा मया घुरे हे
माई पिल्ला के पसीना मा
लत-फत ले मया हा चुरे हे

खड़ा होथे जब अइसन
घर-कुरिया के भथिया
तभे सब मा मया पिरोथे