मंगलवार, 21 मार्च 2017

मदिरा सवैया

रूप न रंग न नाम हवे कुछु, फेर बसे हर रंग म हे ।
रूप बने न कभू बिन ओखर, ओ सबके संग म हे ।।
नाम अनेक भले कहिथे जग, ईश्वर फेर अनाम हवे ।
केवल मंदिर मस्जिद मा नहि, ओ हर तो हर धाम हवे ।।

सोमवार, 20 मार्च 2017

छंदकार रमेश चौहान के दोहा



"अपन अभिव्यक्ति के सुघ्घर मंच"

छंदकार रमेश चौहान के नवगीत-‘‘मैं तो बेटी के बाप‘‘



"अपन अभिव्यक्ति के सुघ्घर मंच"

छंदकार रमेश चौहान के कुण्डलियां-‘महतारी छत्तीसगढ़‘

रविवार, 5 मार्च 2017

जोगीरा सारा रारा

मउरे आमा ममहावय जब, नशा म झूमय साँझ ।
फाग गीत मा बाजा बाजे, ढोल नगाड़ा झाँझ ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

सपटे सपटे नोनी देखय, मचलत हावे बाबू ।
कइसे गाल गुलाल मलवं मैं, दिल हावे बेकाबू ।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

दाई ल बबा हा कहत हवय, डारत-डारत रंग ।
जिनगी मोर पहावत जावय, तोर मया के संग ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

भइया-भौजी खेलत होरी, डारत रंग गुलाल ।
नंनद देखत सोचत हावय, कब होही जयमाल ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

होली हे होली हे होली, धरव मया के रंग ।
प्रेम जवानी सब मा छाये, सबके एके ढंग ।।
जोगीरा सारा रारा ..
जोगीरा सारा रारा ..

चल न घर ग

भृंग छंद नगण (111) 6 बार अंत म पताका (21)

चल न घर ग, बिफर मत न, चढ़त हवय दारू ।
कहत कहत, थकत हवय, लगत हवय भारू ।।
लहुट-पहुट, जतर-कतर, करत हवस आज ।
सुनत-सुनत, बकर-बकर, लगत हवय लाज ।।

शनिवार, 4 मार्च 2017

भठ्ठी ल करव बंद

दारू म छठ्ठी छकत हवय गा, दारू म होय बिहाव ।
दारू म मरनी-हरनी होवय, मनखे करे हियाव ।।

दरूहा-दरूहा के रेम लगे, सजे रहय दरबार ।
दारू चुनावी दंगल गढ़थे, अउ गढ़थे सरकार ।।

गली-गली मा शोर परत हे, भठ्ठी ल करव बंद ।
पीयब छोड़ब कहय न कोनो, कहय रमेशानंद ।।

शुक्रवार, 3 मार्च 2017

लोकतंत्र मा छूट हवे

आजादी हे बोलब के, तभे फूटत बोल ।
सहिष्णुता के ढाल धऱे, बजावत हस ढोल ।।
देश तोरे राज तोरे, अपन अक्कल खोल ।
बैरी कोन काखर हवे, तहुँ थोकिन टटोल ।।

जतका कर सकस कर बने, सत्ता के विरोध ।
लोकतंत्र मा छूट हवे, कोनो डहर ओध ।।
दाई असन हवय धरती, देश ला मत बाँट ।
आनी-बानी बक बक के, माथा ल झन चाट ।।