सोमवार, 22 मई 2017

देश-भक्ति

हमर धरम तो बस एक हे । देश-भक्ति हा बड़ नेक हे
जनम-भूमि जन्नत ले बड़े । जेखर बर बलिदानी खड़े

मरना ले जीना हे बड़े । जीये बर जीवन हे पड़े
छोड़ गोठ तैं अधिकार के । अपन करम कर तैं झार के

अपने हिस्सा के काम ला । अपने हिस्सा के दाम ला
करना हे अपने हाथ ले । भरना हे अपने हाथ ले

बइमानी भ्रष्टाचार के। झूठ-मूठ के व्यवहार के
जात-पात के सब ढाल ला । तोड़व ये अरझे जाल ला

देश बड़े हे के प्रांत हो । सोचव संगी थोकिन शांत हो
देश गढ़े बर सब हाथ दौ । आघू रेंगे बर सब साथ दौ

मनखे-मनखे एके मान के । सबला तैं अपने जान के
मया-प्रेम मा तैं बांध ले । ओखर पीरा अपने खांध ले

 देश मोर हे ये मान ले । जीवन येखर बर ठान ले
अपने माने मा तो तोर हे । नही त तोरे मन मा चोर हे

शुक्रवार, 19 मई 2017

अपने घर मा खोजत हावे, कोनो एक ठिकाना

अपने घर मा खोजत हावे, कोनो एक ठिकाना ।
छत्तीसगढ़ी भाखा रोवय, थोकिन संग थिराना ।।

सगा मनन घरोधिया होगे, घर के मन परदेशी ।
पाके आमा निमुवा होगे, निमुवा गुरतुर देशी ।।

अपने घर के नोनी-बाबू, आने भाषा बोलय ।
भूत-प्रेत के छांव लगे कस, पर के धुन मा डोलय ।।

अपन ठेकवा मा लाज लगय, पर के भाये दोना ।
दूध कसेली धरय न कोनो, करिया लागय सोना ।।

सरग म मनखे कबतक रहिही, कभू त आही नीचे ।
मनखे के जर धरती मा हे, लेही ओला खीचे ।।

मंगलवार, 16 मई 2017

आँखी म निंदिया आवत नई हे

तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

ऊबुक-चुबुक मनुवा करे
सुरता के दहरा मा
आँखी-आँखी रतिहा पहागे
तोर मया के पहरा मा

चम्मा-चमेली सेज-सुपेती
मोला एको भावत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

मोर ओठ के दमकत रंग ह
लाली ले कारी होगे
आँखी के छलकत आंसू
काजर ले भारी होगे

अइसे पीरा देस रे छलिया
छाती के पीरा जावत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

आनी-बानी सपना के बादर
चारो कोती छाये हे
तोरे मोहनी काया के फोटू
घेरी-बेरी बनाये हे

छाती म आगी दहकत हे
बैरी पिरोहिल आवत नई हे
तोर बिना रे जोही
आँखी म निंदिया आवत नई हे

बुधवार, 3 मई 2017

जनउला-दोहा

जनउला
1.
हाड़ा गोड़ा हे नही, अँगुरी बिन हे बाँह ।
पोटारय ओ देह ला, जानव संगी काँह ।।
2.
कउवा कस करिया हवय, ढेरा आटे डोर ।
फुदक-फुदक के पीठ मा, खेलय कोरे कोर ।।
3.
पैरा पिकरी रूप के, कई कई हे रंग ।
गरमी अउ बरसात मा, रहिथे मनखे संग ।।
4.
चारा चरय न खाय कुछु, पीथे भर ओ चॅूस ।
करिया झाड़ी मा रहय, कोरी खइखा ठूॅस ।।
5.
संग म रहिथे रात दिन, जिनगी बनके तोर ।
दिखय न आँखी कोखरो, तब ले ओखर सोर ।।
6.
हाथ उठा के कान धर, लहक-लहक के बोल ।
मया खड़े परदेश मा, बोले अंतस खोल ।।
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उत्तर
1.कुरता, 2. बेनी/चुन्दी  3.छाता  4.जुंआ  5.हवा  6.मोबाइल

सोमवार, 1 मई 2017

मोर ददा के छठ्ठी हे

मोर ददा के छठ्ठी हे,
नेवता हे झारा-झारा

कथा के साधु बनिया जइसे
मोर बबा बिसरावत गे
आजे-काले करहू कहि-कहि
ददा के छठ्ठी भूलावत गे

सपना बबा ह देखत रहिगे
टूटगे जीनगी के तारा

नवा जमाना के नवा चलन हे
बाबू मोरे मानव
मोर जीनगी ये सपना ल
अपने तुमन जानव

घेरी-घेरी सपना म आके
बबा गोठ करय पिआरा

बबा के सपना मैं ह एक दिन
ददा ले जाके कहेंव
ददा के मुह ल ताकत-ताकत
उत्तर जोहत रहेंव

सन खाये पटुवा म अभरे
चेहरा म बजगे बारा

बड़ सोच-बिचार के ददा
मुच-मुच बड़ हाँसिस
मुड़ डोलावत-डोलवत
बबा के सपना म फासिस

पुरखा के सपना पूरा करव
बेटा मोर दुलारा

छै दिन के छठ्ठी ह जब
होथे महिनो बाद
पचास बसर के लइका होके
देखंव येखर स्वाद

छठ्ठी के काय रखे हे
जब जागव भिनसारा