मंगलवार, 19 सितंबर 2017

मुकतक (पीये बर पानी मिलत नई हे)

ऊपर वाले हा ढिलत नई हे
हमरे भाखा ओ लिलत नई हे
सेप्टिक बर आवय कहां ले
पीये बर पानी मिलत नई हे
-रमेश चौहान

मुक्तक (दूसर ला राखे बर चूरत हस)

अपने भाई ला बेघर करके
बैरी माने तैं बंदूक धरके
दूसर ला राखे बर चूरत हस
अपने भेजा मा भूसा भरके
-रमेश चौहान