शुक्रवार, 28 सितंबर 2018

मया कोखरो झन रूठय

कइसन जग मा रीत बनाये, प्रेम डोर मा सब बंधाये ।
मिलन संग मा बिछुडन जग मा, फेरे काबर राम बनाये ।।

छुटे प्राण ये भले देह ले, हो .......... 2
मया कोखरो झन छूटय,
कभू करेजा झन टूटय

जग बैरी चाहे हो जावय,  हो.........2
मया कोखरो झन रूठय
भाग कोखरो झन फूटय

लोरिक-चंदा हीरे-रांझा,  प्रेम जहर ला मन भर पीये ।
मरय मया मा दूनों प्रेमी,  अपन मया बर जिनगी जीये ।।

छुटे प्राण ये भले देह ले, हो .......... 2
मया कोखरो झन छूटय,
कभू करेजा झन टूटय

जग बैरी चाहे हो जावय,  हो.........2
मया कोखरो झन रूठय
भाग कोखरो झन फूटय


काया बर तो हृदय बनाये, जेमा तो मया जगाये ।
फेरे काबर रामा तैं हा, आगी काबर येमा लगाये ।

छुटे प्राण ये भले देह ले, हो .......... 2
मया कोखरो झन छूटय,
कभू करेजा झन टूटय

जग बैरी चाहे हो जावय,  हो.........2
मया कोखरो झन रूठय
भाग कोखरो झन फूटय

शुक्रवार, 21 सितंबर 2018

एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे

(श्री गोपालदास नीरज  की कविता‘‘जीवन नही मरा करता‘‘ से अभिप्रेरित)

लुका-लुका के रोवइयामन, कान खोल के सुन लौ रे ।
फोकट-फोकट आँसु झरइया, बात मोर ये गुन लौ रे ।।
हार-जीत सिक्का कस पहलू, राखे जीवन हर जोरे ।
एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।

सपना आखिर कहिथें काला, थोकिन तो अब गुन लौ रे ।
आँसु सुते जस आँखी पुतरी,  मन मा पलथे सुन लौ रे ।।
टुटे नींद के जब ओ सपना, का बिगड़े हे तब भोरे ।
एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।

काय गँवा जाथे दुनिया मा, जिल्द ल बदले जब पोथी ।
रतिहा के घोर अंधियारी, पहिरे जब घमहा धोती ।।
कभू सिरावय ना बचपन हा, एक खिलौना के टोरे ।
एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।

कुँआ पार मा कतका मरकी, घेरी-बेरी जब फूटे ।
डोंगा नदिया डूबत रहिथे, घाट-घठौंदा कब छूटे ।।
डारा-पाना हा झरथे भर,  घाम-झांझ कतको झोरे ।
एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।

काहीं ना बिगड़य दर्पण के, जब कोनो मुँह ना देखे ।
धुर्रा रोके रूकय नहीं गा, कोखरोच रद्दा छेके ।।
ममहावत रहिथे रूख-राई, भले फूल लव सब टोरे ।
एकोठन सपना के टूटे, मरय न जीवन हर तोरे ।।
-रमेश चौहान

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

हिन्दी छत्तीसगढ़ी भाखा

हिन्दी छत्तीसगढ़ी भाखा, अंतस गोमुख के गंगा ।
छलछल-छलछल पावन धारा, तन मन ला राखे चंगा ।।
फेशन बैरी छाती छेदय, मिलावटी बिख ला घोरे ।
चुटुर-पुटुर अंग्रेजी आखर, पावन धारा मा बोरे ।।

बुधवार, 19 सितंबर 2018

ये हँसी ठिठोली

ये हँसी ठिठोली, गुरूतुर बोली, मोरे अंतस खोले ।
ये कारी आँखी, हावय साखी, मोरे अंतस डोले ।।
जस चंदा टुकड़ा, तोरे मुखड़ा, मोरे पूरणमासी ।
मन कुहकत रहिथे, चहकत रहिथे, तोरे सुन-सुन हाँसी ।।

सोमवार, 10 सितंबर 2018

एक रही हम मनखे जात

तोर मोर हे एके जात, दूनों हन मनखे प्राणी ।
नेक सोच ला अंतस राख, करबो गा हमन सियानी ।।
तोर मोर ले बड़का देश, राखब हम एला एके ।
नो हन कोनो बड़का छोट, बुरा सोच देथन फेके ।।

अगड़ी-पिछड़ी कइसन जात, अउ ये दलित आदिवासी ।
बांट रखे  हमरे सरकार, इही काम हे बदमासी ।।
वोट बैंक पर राखे छांट, नेता के ये शैतानी ।
एक रही हम मनखे जात, छोड़-छाड़ अब नादानी ।।

-रमेश चौहान