बुधवार, 18 सितंबर 2013

मोर मयारू गणेश

दोहा -    सबले पहिले होय ना, गणेश पूजा तोर ।
    परथ हवं मै गोड़ गा, विनती सुन ले मोर ।।

    जऊन भक्त शरण परय, ले श्रद्धा विश्वास ।
    श्रीगणेश पूरन करय, ऊखर जम्मो आस ।।

          चौपाई
हे     गौरा  गौरी  के    लाला । हे  प्रभू  तै    दीन   दयाला
सबले पहिली तोला सुमरव । तोरे गुण गा के मै झुमरव ।।1।।

तही  तो  बुद्धि के देवइया । तही  प्रभू  दुख  के हरइया
वेद पुराण तोरे गुण गाय । तोर महिमा ल भारी बताय ।।2।।

धरती हे दाई अकास ददा । ऐ बात कहेव तू मन सदा
तोर बात ले गदगद भोला । बना दिहीस ग गणेश तोला ।।3।।

शुरू करय जऊन ह काम अपन । हे प्रभू ले के नाम जपन
जम्मो  के  होवय  काम  सफल । नई देवय कोनो विघ्न दखल ।।4।।

जइसन लम्बा सूड़ ह तोरे । लम्बा कर दव सोच ल मोरे
जइसन  भारी  पेट ह तोरे । गहरा कर दव सोच ल मोरे ।।5।।

गौरी    दुलार   भाथे    तोला । ओइसने  दुलार  दव  मोला
जस मिठ मोदक भाये तोला । मिठ मिठ भाखा दे दव मोला ।।6।।

हे एकदन्त एक  किरपा करहु । मोर बुद्धि ल कभ्भू झन हरहु
लेवव नाम ल संझा बिहनिया । काम पूरा होवय सब दुनिया ।।7।।

हे   मोर  आखर  के   देवता । गाड़ा  गाड़ा  तोला  न्योता
हे देव कुमति के नाश करव । प्रभू सुमति मोर भाल भरव ।।8।।

अपन पुरखा अऊ माटी के । अपन जंगल अऊ घाटी के
करवं मै निशदिन परनाम । सदा बने रहय ईखर मान ।।9।।

नारद शारद जस ला गावय । ‘रमेश‘ गवार का कहि सुनावय
हे   रिद्धी  सिद्धी   के    दाता । अब दुख मेटव भाग्य विधाता ।।10।।


दोहा-    जब जब भक्त शरण परय, मेटय सकल कलेष ।
             सुख देवय पिरा ल हरय, मोर मयारू गणेश ।।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

छत्तीसगढ़ी दोहा

छत्तीसगढ़ी दोहा


   हर भाखा के कुछु न कुछु, सस्ता महंगा दाम ।
   अपन दाम अतका रखव, आवय सबके काम ।।

   दुखवा के जर मोह हे , माया थांघा जान ।
   दुनिया माया मोह के, फांदा कस तै मान।।

   ये जिनगी कइसे बनय, ये कहूं बिखर जाय ।
   मन आसा विस्वास तो, बिगड़े काम बनाय ।।




....‘रमेश‘...

रविवार, 8 सितंबर 2013

हे गौरी के लाल


बुद्धि के देवइया अऊ पिरा के हरइया हे गज मुख  वाला ।
सबले पहिली तोला सुमिरव हे षंकर सुत गौरी के लाला ।।

वेद पुरान जम्मो तोरे च गुन ल गाय हे,
सबले पहिली श्रीगणेष कहव बताय हे ।
सभो देवता ले पहिली सुमिरन तोरे कहाये हे,
हे परभू मोरो अंतस ह तोरे च गुन ल गाये हे ।

शुरू करत हव तोर नाम ले, ये कारज गृह जंजाला,
हे गजानन दया करहू झन होवय कुछु गड़बड़ झाला । हे गौरी के लाला.........

जइसे लंबा लंबा सूड़ तोरे,
लंबा कर दव सोच ल मोरे ।
जइसन भारी पेट तोरे,
गहरा बना दव विचार ल मोरे ।

अपन माटी अऊ अपन पुरखा के सेवा गावंव ले सुर लय ताल ।
हे एकदन्त एक्केच किरपा करहू बुद्धि ले झन रहव मै कंगाल ।। हे गौरी के लाल.....

जइसे भाते उमा महेश के मया ह तोला,
ओइसने अपन मया दे दव मोला ।
मिठ मिठ लाडू जइसे भाते तोला,
ओइसने गुतुर गुतुर भाखा दे दव मोला ।

कुमति के नाश कर सुमति ले भर दौव मोरो भाल ।
हे आखर के देवता मोरो गीत ल लौव सम्हाल ।। हे गौरी के लाल............


दाई ल धरती ददा ल अकास कहिके कहाय गणेश,
तोर ये बुद्धि ल जम्मो देवता ले बड़का कहे हे महेश ।
तोरे च शरण आये नारद अऊ सब देवता संग सुरेश ,
हे दयावंत तुहरे शरण आये हे ये मुरख ‘रमेश‘ ।।

रिद्धी सिद्धी के दाता प्रभू सिंदुर सोहे तोर भाल ।
मोरो दुख मेटव हे गौरी के लाल, हे गौरी के लाल ।।

-रमेश चैहान

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं

भादो के महीना घटा छाये अंधियारी,
बड़ डरावना हे रात कारी कारी ।

कंस के कारागार बड़ रहिन पहेरेदार,
चारो कोती चमुन्दा हे खुल्ला नईये एकोद्वार ।

देवकी वासुदेव पुकारे हे दीनानाथ,
अब दुख सहावत नइये करलव सनाथ ।

एक एक करके छैय लइका मारे कंस,
सातवइया घला होगे कइसे अपभ्रंस ।

आठवईंया के हे बारी कइसे करव तइयारी,
ऐखरे बर होय हे आकाशवाणी हे खरारी ।

मन खिलखिवत हे फेर थोकिन डर्रावत हे,
कंस के काल हे के पहिली कस एखरो हाल हे ।

ओही समय चमके बिजली घटाटोप,
निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप ।

बिजली अतका के जम्मो के आंखी कान मुंदागे,
दमकत बदन चमकत मुकुट चार हाथ वाले आगे ।

देवकी वासुदेव के हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे,
जम्मो पहरेदारमन ल बड़ जोर के निदं आगे ।

देखत हे देवकी वासुदेव त देखत रहिगे,
कतका सुघ्घर हे ओखर रूप मनोहर का कहिबे ।

चिटक भर म होइस परमपिता के ऊंहला भान,
नाना भांति ले करे लगिन ऊंखर यशोगान ।

तुहीमन सृष्टि के करइवा अव जम्मो जीव के देखइया अव,
धरती के भार हरइया अऊ जीवन नइया के खेवइया अव ।

मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान,
बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान ।

प्रगटे आज तो भगवान मंगल गाओं,
खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं ।

..............‘‘रमेश‘‘............