रविवार, 4 मई 2014

कोनो गांव नई जांव

हमर ममा गांव मा, होवत हे गा बिहाव ।
दाई अऊ बाई दुनो, कहत हे जाबो गांव ।।


दाई कहे बाबू सुन, मोर ममा के नाती के ।
घात सुघ्घर आदत, का तोला बतांव ।।

वो ही बाबू के बिहाव, होवत हे ग ना आज ।
मुंह झुंझूल ले जाबो, बाढ़ गे हे तांव ।।


तोर सारी दुलौरीन, मोर ममा के ओ नोनी ।
घेरी घेरी फोन करे, भेजे मया ले बुलांव ।।

मोटरा जोर मैं हर, करत हंव श्रृंगार ।
काल संझकेरहे ले, जाबो जोही ममा गांव ।।

सियानीन मोटियारी, टूरा होवय के टूरी ।
सब्बो ला घाते भाथे, अपनेच ममा गांव ।।

एके तारीक म हवे, दुनो कोती के बिहाव ।
सोच मा परे हवंव, काखर संग मैं जांव ।।

दाई संग जाहूं मै ता, बाई ह बड़ रिसाही ।
गाल मुंह ल फुलेय, करही गा चांव चांव ।।

बाई संग कहूं जाहूं, दाई रो रो देही गारी ।
ये टूरा रोगहा मन, डौकीच ला देथे भाव ।।

बड़ मुश्किल हे यार, सुझत नई ये कुछु ।
काखर संग मैं जांव, काला का कहि मनांव ।।

नानपन ले दाई के, घात मया पाय हंव ।
मन ले कहत हंव, दाई जिनगी के छांव ।।

अब तो सुवारी बीना, जिनगी लागे बेमोल ।
जोही बीना जग सुन्ना, लगे जिनगी के दांव ।।

छोड़ नई सकव मैं, दाई बाई दुनो ला तो ।
बिमार हो मै कहेंव, कोनो गांव नई जांव ।।

-रमेश

शुक्रवार, 2 मई 2014

मोर नोनी


खेलत घरघुन्दिया, गली खोर मोर नोनी ।
धुर्रा धुर्रा ले बनाय, घर चारो ओर नोनी ।।

बना रंधनही खोली, आनी बानी तै सजाय ।
रांधे गढ़े के समान, जम्मा जोर जोर नोनी ।।

माटी के दिया ह बने, तोर सगली भतली ।
खेल खेल म चुरय, साग भात तोर नोनी ।।

सेकत चुपरत हे, लइका कस पुतरी ।
सजावत सवारत, चेंदरा के कोर नोनी ।।

अक्ती के संझा बेरा, अंगना गाढ़े मड़वा ।
नेवता के चना दार, बांटे थोर थोर नोनी ।।

पुतरा पुतरी के हे, आजे तो दाई बिहाव ।
दे हव ना टिकावन, कहे घोर घोर नोनी ।।

कका ददा बबा घला, आवा ना तीर मा ।
दू बीजा चाऊर टिक, कहय गा तोर नोनी ।।

माईलोगीन के बूता, ममता अऊ दुलार ।
नारीत्व के ये स्कूल मा, रोज पढ़े मोर नोनी

बनिहार

करय काम बनिहार हा, पसीना चूचवाय ।
अपन पेट ला वो भरय, दू पइसा म भुलाय ।।
दू पइसा म भुलाय, अपन घर म खुश रहय रे ।
जग के चिंता छोड़, जगे बर वो जीयय रे ।।
कइसे कहय ‘रमेश‘, रोज जीयय अऊ मरय ।
बिसार खुद के काम, रोज तोरे काम करय ।।