सोमवार, 27 नवंबर 2017

करम बड़े के भाग

फांदा मा चिरई फसे, काखर हावे दोष ।
भूख मिटाये के करम, या किस्मत के रोष ।।
या किस्मत के रोष, काल बनके हे आये ।
करम बड़े के भाग, समझ मोला कुछु ना आये ।।
सोचत हवे ‘रमेश‘, अरझ दुनिया के थांघा ।
काखर हावे दोष, फसे चिरई हा फांदा ।।

पहा जथे हर रात, पहाती बेरा देखत

देखत कारी रात ला, मन मा आथे सोच ।
कुलुप अंधियारी हवय, खाही हमला नोच ।
खाही हमला नोच, हमन बाचन नहिं अब रे ।
पता नही भगवान, रात ये कटही कब रे ।।
धर ले गोठ ‘रमेश‘, अपन मन ला तैं सेकत ।
पहा जथे हर रात, पहाती बेरा देखत ।

लंबा लबरा जीभ

खाये भर बर तो हस नही, लंबा लबरा जीभ ।
बोली बतरस मा घला, गुरतुर-गुरतुर नीभ ।।
गुरतुर-गुरतुर नीभ, स्वाद दूनों तैं जाने ।
करू-करू के मीठ,  बने कोने ला तैं माने ।।
पूछत हवय ‘रमेश‘,  मजा कामा तैं पाये ।
गुरतुर बोली छोड़, मीठ कतका तैं खाये ।।

शनिवार, 25 नवंबर 2017

आंगा-भारू लागथे

आंगा-भारू लागथे, हमरे देश समाज ।
समझ नई आवय कुछुच, का हे येखर राज ।।
का हे येखर राज, भरे के अउ भरते हे ।
दुच्छा वाले आज, झरे ऊँपर झरते हे ।।
सोचत हवे ‘रमेश‘, जगत हे गंगा बारू ।
माने मा हे देव, नहीं ता आंगा-भारू ।।

गुरुवार, 23 नवंबर 2017

करम तोर पहिचान हे

अपने ला पहिचान, देह हस के तैं आत्मा ।
पाँच तत्व के देह, जेखरे होथे खात्मा ।।
देह तत्व ले आन, अमर आत्मा हा होथे ।
करे देह ला यंत्र, करम फल ला वो बोथे ।।
रंग-रूप ला छोड़ के, करम तोर पहिचान हे ।
मनखेपन ला मान,  तोर येही अभिमान हे ।।

बुधवार, 22 नवंबर 2017

बरवै छंद

1. हमर गाँव के धरती, सबले पोठ ।
गुरतुर भाखा बोली, गुरतुर गोठ ।।

2. तुँहर पेट ला भरथे, हमर किसान ।
मन ले कर लौ संगी, ओखर मान ।।

3. झूठ लबारी के हे, दिन तो चार ।
सत के सत्ता होथे, बरस हजार ।।

4. सत के रद्दा मा तो  हे भगवान ।
मोर गोठ ला संगी, सिरतुन जान ।।

5.जइसन बीजा होथे, तइसन झाड़ ।
सोच-समझ के संगी,  रद्दा बाढ़ ।।

6. सुख-दुख हा तो होथे, जस दिन रात ।
एक-एक कर आथे, सिरतुन बात ।।

7. धरम करम मा बड़का, होथे कोन ।
करम धरम ला गढ़थे, होके मोन ।।

8. बेजाकब्जा छाये, जम्मो गाँव ।
तोपा गे रूख-राई, बर के छाँव ।।

9.शिक्षा मा तो चाही, अब संस्कार ।
तब ना तो मिटही गा, भ्रष्टाचार ।।

10 घुसखोरी ले बड़का, भ्रष्टाचार ।
येला छोड़े बर तो, देश लचार ।

मंगलवार, 7 नवंबर 2017

ये गांव ए (मधुमालती छंद)

सुन गोठ ला, ये गांव के। ये देश के, आें ठांव के
जे देश के, अभिमान हे । संस्कार के पहिचान हे

परिवार कस, सब संग मा, हर बात मा, हर रंग मा
बड़ छोट सब, हा एक हे । हर आदमी, बड़ नेक हे

दुख आन के, जब देखथें । निज जान के, सब भोगथे
जब देखथे, सुख आन के । तब नाचथे, ओ तान के

हर रीत ला, सब जानथें । मिल संग मा, सब मानथें
हर पर्व के, हर ढंग ला । रग राखथे, हर रंग ला

ओ खेत मा, अउ खार मा । ओ मेढ़ मा, अउ पार मा
बस काम ला, ओ जानथे । भगवान कस, तो मानथे

संबंध ला, सब बांध के । अउ प्रीत ला, तो छांद के
निक बात ला, सब मानथे । सब नीत ला, भल जानथे

चल खेत मा, ये बेटवा । मत घूम तैं, बन लेठवा
कह बाप हा, धर हाथ ला । तैं छोड़ झन, गा साथ ला

ये देश के, बड़ शान हे । जेखर इहां तो मान हे
ये गांव ए, ये गांव ए । ए स्वर्ग ले, निक ठांव ए

शुक्रवार, 3 नवंबर 2017

हे काम पूजा

तैं बात सुन्ना । अउ बने गुन्ना
जी भर कमाना । भर पेट खाना

ये पूट पूजा । ना करे दूजा
जीनगी जीबे । जब काम पीबे

बिन काम जोही । का तोर होही
हे पेट खाली । ना बजे ताली

ये एक बीता । हे रोज रीता
तैं भरे पाबे । जब तैं कमाबे

परिवार ठाढ़े । अउ बुता बाढ़े
ना हाथ पैसा । परिवार कैसा

जब जनम पाये । दूधे अघाये
जब गोड़ पाये । तब ददा लाये

खाई खजेना । तैं हाथ लेना
लइका कहाये । खेले भुलाये

ना कभू सोचे । कुछु बात खोचे
काखर भरोसा । पांचे परोसा

आये जवानी । धरके कहानी
अब काम खोजे । दिन रात रोजे

पर के सपेटा । खाये चपेटा
तैं तभे जाने । अउ बने माने

संसार होथे । दुख दरद बोथे
जब हाथ कामे । तब होय नामे

तैं बुता पाये । दुनिया बसाये
दिन रात फेरे । जांगर ल पेरे

ये पेट सेती । तैं करे खेती
प्रिवार पोसे । बिन भाग कोसे

बस बुता कामे । कर हाथ ताने
जब काम होथे । सब मया बोथे

बेरा पहागे । जांगर सिरागे
डोकरा खॉसे । छोकरा हॉसे