हम तो लईका संगी, आन नवा जमाना के । विकास गाथा गढ़बो, नवा नवा सोच ले ।। ऊॅच नीच के गड्ठा ला, आज हमन पाटबो । नवा रद्दा ला गढ़बो, नवा नवा सोच ले ।। जात पात धरम के, आगी तो दहकत हे । शिक्षा के पानी डारबो, नवा नवा सोच ले ।। भ्रष्टाचार के आंधी ला, रोकबो छाती तान के । ये देश ला चमकाबो, नवा नवा सोच ले ।। दारू मंद के चक्कर, हमला नई पड़ना । नशा के जाल तोड़बो, नवा नवा सोच ले ।। जवानी के जोश मा, ज्वार भाटा उठत हे । दुश्मन ला खदेड़बो, नवा नवा सोच ले ।। हर भाषा हमार हे, हर प्रांत हा हमार । भाषा प्रांत ला उठाबो, नवा नवा सोच ले ।। नवा तकनीक के रे, हन हमूमन धनी । तिरंगा ला फहराबो, नवा नवा सोच ले ।।
हास्य नज़्म-प्रो.रवीन्द्र प्रताप सिंंह
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उस्तरा ले के बुलाता है हज्जाम,चले आओलेना है इन जुल्फों से इंतकाम चले आओ ।
रंग ओ रोगन से छुपाई है जो सफेदी इनकीदेखो उसका क्या होगा अंजाम, चले आओ ।
कैंचियां ...
1 हफ़्ते पहले