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कतका झन देखे हें-

जसगीत

गढ़ बिराजे हो मइया, छत्तीसगढ़ मा बिराजे हो माय गढ़ बिराजे हो मइया, छत्तीसगढ़ मा बिराजे हो माय रायपुर रतनपुर नवागढ़, महामाई बन बिराजे बम्लेश्वरी डोंगरगढ, पहडि़या ऊपर राजे बेमेतरा दुरूग मा, भद्रकाली चण्डी बाना साजे नाथल दाई नदिया भीतर, चंद्रहासनी संग बिराजे हो माय । तिफरा मा कालीमाई, डिंडेश्वरी मल्हारे बस्तर के दंतेवाड़ा, दंतेश्वरी संवारे सिंगारपुर मौलीमाता, भगतन के रखवारे खल्लारी मा खल्लारी माता, अंबिकापुर मा समलेश्वरी बिराजे हो माय गांव गांव पारा पारा, तोर मंदिर देवालय भाथे भगतन जाके तोर दुवरिया, अपन माथ नवाथे आनी बानी मन के मनौती, रो रो तोला गोहराथे सबके पीरा के ते हेरईया, सबके मन बिराजे हो माय । गढ़ बिराजे हो मइया, छत्तीसगढ़ मा बिराजे हो माय गढ़ बिराजे हो मइया, छत्तीसगढ़ मा बिराजे हो माय -रमेशकुमार सिंह चौहान

गोठ मोरे तै गुनबे

नवा नवा तो जोश, देख हे लइका मन के । भरना मुठ्ठी विश्व, ठान ले हे बन ठन के ।। धर के अंतरजाल, करे हें माथा पच्ची । एक काम दिन रात, करे सब बच्चा बच्ची ।। मोबाईल कम्प्यूटर युग, परे रात दिन फेर मा । पल मा बादर ला अमरथे, सुते सुते ओ ढेर मा ।। होय नफा नुकसान, काम तै कोनो कर ले । करे यंत्र ला दास, फायदा झोली भर ले ।। बने कहूं तै दास, अपन माथा ला धुनबे । आज नही ता काल, गोठ मोरे तै गुनबे ।। अकलमंद खुद ला मान के, करथस तै तो काम रे । अड़हा नइये दाई ददा, खरा सोन हे जान रे ।। -रमेशकुमार सिंह चौहान

संझा (अनुदित रचना)

मूल रचना - ‘‘संध्या सुंदरी‘‘ मूल रचनाकार-श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला‘ -------------------------------------------- बेरा ऐती न ओती बेरा बुडत रहिस, करिया रंग बादर ले सुघ्घर उतरत रहिस, संझा वो संझा, सुघ्घर परी असन, धीरे धीरे धीरे............... बुड़ती म, चुलबुलाहट के अता पता नइये ओखर दूनो होट ले टपकत हे मधुरस, फेर कतका हे गंभीर .... न हसी न ठिठोली, हंसत  हे त एके ठन तारा, करिया करिया चुंदी मा, गुथाय फूल गजरा असन मनमोहनी के रूप संवारत चुप्पी के नार वो तो नाजुक कली चुपचाप सिधवा के गर मा बहिया डारे बादर रस्ता ले आवत छांव असन नई बाजत हे हाथ मा कोनो चूरी न कोई मया के राग न अलाप मुक्का हे साटी के घुंघरू घला एक्के भाखा हे ओहू बोले नई जा सकय चुप चुप एकदम चुप ए ही हा गुंजत हे बदर मा, धरती मा सोवत तरिया मा, मुंदावत कमल फूल मा रूप के घमंडी नदिया के फइले छाती मा धीर गंभीर पहाड़ मा, हिमालय के कोरा मा इतरावत मेछरावत समुंद्दर के लहरा मा धरती आकास मा, हवा पानी आगी मा एक्के भाखा हे ओहू बोले नई जा सकय चुप चुप एकदम चुप एही हा गुंजत हे अउ का हे, कुछु नइये नशा धरे...

पढ़ई पढ़ई

पढ़ई पढ़ई अइसन पढ़ई ले आखिर का होही । गुदा के अता पता नइये बाचे हवव बस गोही ।। कौड़ी के न काम के जांगर चोर भर तो होही । रात भर जागे हे बाबू, दिन भर अब तो सोही ।। न ओला पुरखा के मान हे न देश धरम के ज्ञान । अंग्रेजियत देखा देखा हमन ला तो अब बिट्टोही ।। विदेसी सिक्षा जगावय विदेसी संस्कृति के अभिमान । अपन धरम ला मानय नही बाबू बनगे अब कुल द्रोही ।। रीति रिवाज संस्कृती ला देवत हे अंधविश्वास के नाम । बिना विश्वास के देश परिवार समाज कइसे के होही ।। लईका पढ़थ हे कहिके, कोनो नई करावय कुछु काम । रूढ़ाय जांगर ले आखीर काम कइसे करके होही ।। लईका पढ़त लिखत हे घाते फेर कढ़त नइये । कढ़े बिना सूजी मा धागा कइसे करके पिरोही ।। पागे कहु नौकरी चाकरी त होगे परदेशिया । बुढ़ाय दाई ददा के डोंगा ला अब कोन खोही ।। नई पाइस कहूं कुछु काम ता घर के ना घाट के माथा धर के बाबू अब तो काहेक के  रोही ।। सिरतुन कहंव चाहे कोनो गारी देवव के गल्ला । गांव-गली नेता अऊ ऊखर चम्मच के अब भरमार होही । इंकरे आये ले होवत हे भ्रष्टाचार के अतका हल्ला । ईखर मन के करम ले अब देश शरमसार तो होही ।।

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