भाखा गुरतुर बोल तै, जेन सबो ल सुहाय । छत्तीसगढ़ी मन भरे, भाव बने फरिआय ।। भाव बने फरिआय, लगय हित-मीत समागे । बगरावव संसार, गीत तै सुघ्घर गाके । झन गावव अश्लील, बेच के तै तो पागा । अपन मान सम्मान, ददा दाई ये भाखा ।।
आधुनिक शिक्षा और भारतीय संस्कृति का संकट
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प्रस्तावना भारत की संस्कृति, संस्कार और परम्पराएँ हजारों वर्षों की तपस्या,
अनुभव और सामाजिक प्रयोगों का परिणाम हैं। इन्होंने केवल एक सभ्यता का निर्माण
नहीं...
4 दिन पहले