गंवा गे जी गांव, कहूं देखे हव का गा । बइठे कोनो मेर, मुड़ी मा बांधे पागा ।। खोंचे चोंगी कान, गोरसी तापत होही । मेझा देवत ताव, देख इतरावत होही ।।1।। कहां खदर के छांव, कहां हे पटाव कुरिया । ओ परछी रेंगान, कहां हे ठेकी चरिया ।। मूसर काड़ी मेर, हवय का संगी बहना । छरत टोसकत धान, सुनव गा दाई कहना ।।2।। टोड़ा पहिरे गोड़, बाह मा हे गा बहुटा । कनिहा करधन लोर, सूतिया पहिरे टोटा ।। सुघ्घर खिनवा ढार, कान मा पहिरे होही । अपने लुगरा छोर, मुडी ला ढाॅंके होही ।।3।। पिठ्ठुल छू छूवाल, गली का खेलय लइका । ओधा बेधा मेर, लुकावत पाछू फइका ।। चर्रा खुड़वा खेल, कहूं का खेलय संगी । उघरा उघरा होय, नई तो पहिरे बंडी ।।4।। घर मोहाटी देख, हवय लोहाटी तारा । गे ...
गीत : आज बंधे दो मन एक डोर में
-
*मुखड़ा (युगल)*
आज बंधे दो मन एक डोर में
सपनों की उजली भोर में
तुम हाथ पकड़ कर साथ चलो
मैं छाया बन जाऊँ हर मोड़ में
आज बंधे दो मन एक डोर में
*अंतरा 1 (स...
3 घंटे पहले