रविवार, 24 अगस्त 2014

जानव अपन छंद ला

पाठ-1
छंद के पहिचान

श्री गणपति गणराज के, पहिली पाँव पखार ।
लिखंव छंद के रंग ला, पिंगल भानु विचार ।।

होहू सहाय शारदे, रहिहव मोरे संग ।
कविता के सब गुण-धरम, भरत छंद के रंग ।।

गुरू पिंगल अउ भानु के, सुमरी-सुमरी नाम ।
नियम-धियम रमेश‘ लिखय, छंद गढ़े के काम ।।

छंद वेद के पाँव मा, माथा रखय ‘रमेश‘ ।
छंद ज्ञान के धार ला, जग मा भरय गणेश ।।

छंद-

आखर गति यति के नियम, आखिर एके बंद ।
जे कविता मा होय हे, ओही होथे छंद ।।

अनुसासन के पाठ ले, बनथे कोनो छंद ।
देख ताक के शब्द रख, बन जाही मकरंद ।।

कविता के हर रंग मा, नियम-धियम हे एक ।
गति यति लय अउ वर्ण ला, ध्यान लगा के देख ।।

छंद के अंग-
गति यति मात्रा वर्ण तुक, अउ गाये के ढंग ।
गण पद अउ होथे चरण, सबो छंद के अंग ।।

गति-
छंद पाठ के रीत मा, होथे ग चढ़ उतार ।
छंद पाठ के ढंग हा, गति के करे सचार ।।

यति-
छंद पाठ करते बखत, रूकथन जब हम थोर ।
बीच-बीच मा आय यति, गति ला देथे टोर ।।

आखर -
आखर के दू भेद हे, स्वर व्यंजन हे नाम ।
‘अ‘ ले ‘अः‘ तक तो स्वर हे, बाकी व्यंजन जान ।
बाकी व्यंजन जान, दीर्घ लघु जेमा होथे ।
‘अ‘ ‘इ‘ ‘उ‘ ह लघु स्वर आय, बचे स्वर दीर्घ कहाथे ।
लघु स्वर जिहां समाय, होय लघु ओमा साचर ।
जभे दीर्घ स्वर आय, दीर्घ हो जाथे आखर ।।

मातरा-
आखर के गिन मातरा, लघु के होथे एक ।
दीर्घ रखे दू मातरा, ध्यान लगा के देख ।
ध्यान लगा के देख, शब्द बोले के बेरा ।
परख समय ला बोल, लगय कमती के टेरा ।।
कमती होथे एक, टेर ले होथे चातर ।
‘‘कोदू‘ ‘कका‘ ल देख, गिने हे अपने आखर ।।

तुक-
जेन शब्द के अंत के, स्वर व्यंजन हे एक ।
एक लगय गा सुनब मा, तुक हो जाथे नेक ।।

लय -
गति अउ यति के मेल ले, होथे लय साकार ।
गुरतुर बोली लय बनय, मोहाजय संसार ।।

गण-
तीन-तीन आखर मिले, आये एक समूह ।
लघु गुरू के क्रम ला कहव, कविता के गण रूह ।।

तीन-तीन आखर जोड़ हा, रचे हवे गण आठ ।
यम तर जभ नस नाम ले, गढ़थे आखर बाट ।।

शुरू आखिर अउ बीच मा, यग तग रग लघु होय ।
भग सग जग मा होय गुरू, मग गुरू नग लघु बोय ।।



1. दोहा
चार चरण दू डांड़ के, होथे दोहा छंद ।
तेरा ग्यारा होय यति, रच ले तैं मतिमंद ।।1।।

विषम चरण के अंत मा, रगण नगण तो होय ।
तुक बंदी  सम चरण रख, अंत गुरू लघु होय ।।2।।

2-सोरठा-
पलटव दोहा छंद, बन जाही गा सोरठा ।
रचलव गा मतिमंद, ग्यारा तेरा देत यति ।।

विषम चरण तुक देत, रख लव ग्यारा मातरा ।
अइसे सुग्घर नेत, तेरा होवय सम चरण ।।


3.रोला
आठ चरण पद चार, छंद सुघ्घर रोला के ।
ग्यारा तेरा होय, लगे उल्टा दोहा के ।।
विषम चरण के अंत, गुरू लघु जरूरी होथे ।
गुरू गुरू के जोड़,  अंत सम चरण पिरोथे ।।

4. कुण्डलिया
1.    रोला दोहा जोड़ के, रच कुण्डलिया छंद ।
    दोहा के पद आखरी, रोला के शुरू बंद ।।
    रोला के शुरू बंद, संग मा दूनो गुथे ।
    दोहा रोला छंद, एक माला कस होथे ।।
    शुरू मा जऊन षब्द, अंत मा रख तैं ओला।
    कुण्डल जइसे कान, लगे गा दोहा रोला  ।।

2.    कुण्डलिया के छंद बर , दोहा रोला जोड़ ।
    शब्द जेन शुरूवात के, आखरी घला छोड़ ।।
    आखरी घला छोड़, मुड़ी पूछी रख एके ।
    रोला के शुरूवात,  आखरी पद दोहा के ।।
    शब्द भाव हा एक, गुथे हे जस करधनिया ।
    दोहा रोला देख, बने सुघ्घर कुण्डलिया ।।
5-कुन्डलिनी छंद
कुन्डलिनी के छंद हा, कुण्डलियां ले आन ।
दोहा के पाछू रखव, आधा रोला तान ।
सबो गांठ ला छोड़, जोड़ लव दोहा रोला ।
कुन्डलिनी के छंद, रचे मोरे कस भोला ।।


6.आल्हा छंद

दू पद चार चरण मा बंधे, रहिथे सुघ्घर आल्हा छंद ।
विषम चरण के सोलह मात्रा, पंद्रह मात्रा बाकी बंद ।।

वीर छंद ऐही ला कहिथे, विशेष गुण हे ऐखर ओज ।
तन मन मा जोश भरे संगी, तुमन लिखव गावव गा रोज ।।

7.कामरूप छंद
तीन तीन चरण, चार पद मा,  कामरूप हा होय ।
नौ सात दस मा, देत यति गा, रचव जी हर कोय ।।
दीर्घ ले शुरू कर, दीर्घ लघु ले, होय हर पद अंत ।
दू दू पद म तो, रखे तुक ला, रचे हवय ग संत ।।

8.गीतिका छंद
गीत गुरतुर गा बने तैं, गीतिका के छंद ला ।
ला ल ला ला ला ल ला ला, ला ल ला ला ला ल ला ।
मातरा छब्बीस होथे, चार पद सुघ्घर गुथे ।
आठ ठन एखर चरण हे, गीतिका एला कथे ।।

9.छप्पय छंद
रच लव छप्पय छंद, जोड़ रोला उल्लाला ।
आठ चरण पद चार, छंद बनथे गा रोला ।।
मात्रा हे चैबीस, देत यति ग्यारा तेरा ।
उल्लाला उल्लाल, ढंग दू होथे मेरा ।।
उल्लाला अउ उल्लाल के, चार चरण पद चार हे ।
विषम चरण मा गा भेद हे, तेरा तेरा सम एक हे ।।

10.कज्जल छंद
सुग्घर कज्जल गढ़व छंद । चउदा-चउदा राख बंद
आखिर गुरू-लघु दुई-एक । कज्जल होही गजब नेक

चउदा मात्रा चरण चार ।
आखिर गुरू-लघु रहय भार ।।
कज्जल जेखर हवे नाम ।

11.त्रिभंगी छंद
बत्तीस मातरा, जांच लौ खरा, छंद त्रिभंगी, मा आथे ।
चार चरण साटेे, शुरू दस आठे,  जेमा एके, तुक भाथे ।।
आठ पाछू छैय, करव गा जैय, तीन घा टोर, सब गाथे ।
जेखर चारो पद, मानय ये हद, आखिर म गुरू, तो आथे ।।

12.चौपाई छंद-
चौपाई खटिया ला कहिथे । चार खुरा तो जेमा होथे
चारो खुरा बरोबर होथे । तब मनखे तन के सोथे

सोला सोला मातरा धरे । चार चरण अउ दू पद म भरे
आखिर मा गुरू लघु आवय झन । चौपाई छंद लिखव तू मन

दू-दू पद मा तुक ला डारे । चौपाई छंद गढ़व प्यारे
सोला सोला चारो पद मा । सुग्घर लागय अपने कद मा

13..चौपई-

रखव पंदरा चारे बार । छंद चौपई ला सम्हार
चौपाई ले दूसर होय ।  जानय कवि मन हर कोय

चार चरण दू पद मा यार । दू-दू पद मा तुक ला डार
आखिर म गुरू लघु के जोड़ । छंद चौपई गढ़ बेजोड़

14-चौबोला
चार चरण दू पद मा रखे । दू-दू पद मा तुक ला चखे
आखिर मा लघु गुरू होय हे । सब चरण पंदरा बोय हे

15. रूचिरा छंद
चार चरण चार डांड मा, घाते सुग्घर लगय छंद रूचिरा ।
यति चउदा सोलह मा, राखव पद अंत सगण सुचिरा ।।
निशदिन जे अभ्यास करे, साध मातरा गण अउ कल ला ।
किरपा गणपति षारद के, निष्चित पाथे गुरतुर फल ला ।।

16. सार छंद
सर छंद मा सोला बारा, चार चरण मा होवय ।
दू-दू पद मा सम तुक लेके, आखिर चौकल बोवय ।।

गुरू लघु झन आवय आखिर, धर लौ गठरी बांधे ।
सार सार मा सार छंद हे, गुरतुर लय ला सांधे ।।

17. छन्न पकइया-छन्न पकइया
छन्न पकइया-छन्न पकइया, सार छंद ला जानव ।
तुरते संदेषा दे खातिर, छन्न पकइया तानव ।।

छन्न पकइया-छन्न पकइया, प्रथम चरण मा आथे ।
बाकी तीन चरण हा एके, सार छंद जस भाथे ।।
18- सुगती छंद

चार चरणा । सात गनना
अंत करले । बड़े धरले

19-छबि छंद

छबि छंद ल सवार । हे चरण चार
मात्रा ल आठ । चरणन म गाठ

जगण म पदांत । चरणन समांत
लिखही ‘रमेश‘ । सुमरत गणेश

20-गंग छंद 

हे चरण चारे । नौ भार धारे
नौ गंग राखे । गुरू-गुरू ल भाखे

-रमेशकुमार सिंह चौहान





शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

वाह रे तै तो मनखे

जस भेडि़या धसान, धसे मनखे काबर हे ।
छेके परिया गांव, जीव ले तो जांगर हे ।।
नदिया नरवा छेक, करे तै अपने वासा ।
बचे नही गऊठान, वाह रे तोर तमाशा ।

रद्दा गाड़ी रवन, कोलकी होत जात हे ।
अइसन तोरे काम, कोन ला आज भात हे ।।
रोके तोला जेन, ओखरे बर तै दतगे ।
मनखे मनखे कहय, वाह रे तै तो मनखे ।।

दे दूसर ला दोष, दोष अपने दिखय नही ।
दिखय कहूं ता देख, तहूं हस ग दूसर सही ।।
धरम करम के मान, लगे अब पथरा जइसे ।
पथरा के भगवान, देख मनखे हे कइसे ।

गुरुवार, 21 अगस्त 2014

बेटी (रोला छंद)

बेटी मयारू होय, ददा के सब झन कहिथे ।
दुनिया के सब दर्द, तोर पागा बर सहिथे ।।
ससुरे मइके लाज, हाथ मा जेखर होथे ।
ओही बेटी आज, मुड़ी धर काबर रोथे।।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

कृष्ण जन्माष्टमी


फ़ोटो: आठे कन्हया के लमे बाह भर बधाई

कृष्ण जन्माष्टमी

भादो के महीना, घटा छाये अंधियारी,
बड़ डरावना हे, ये रात कारी कारी ।

कंस के कारागार, बड़ रहिन पहेरेदार,
चारो कोती चमुन्दा, खुल्ला नईये एकोद्वार ।

देवकी वासुदेव पुकारे हे दीनानाथ,
अब दुख सहावत नइये करलव सनाथ ।

एक एक करके छैय लइका मारे कंस,
सातवइया घला होगे कइसे अपभ्रंस ।

आठवईंया के हे बारी कइसे करव तइयारी,
ऐखरे बर होय हे आकाषवाणी हे खरारी ।

मन खिलखिवत हे फेर थोकिन डर्रावत हे,
कंस के काल हे के पहिली कस एखरो हाल हे ।

ओही समय चमके बिजली घटाटोप,
निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप ।

बिजली अतका के जम्मो के आंखी कान मुंदागे,
दमकत बदन चमकत मुकुट चार हाथ वाले आगे ।

देवकी वासुदेव के हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे,
जम्मो पहरेदारमन ल बड़ जोर के निदं आगे ।

देखत हे देवकी वासुदेव त देखत रहिगे,
कतका सुघ्घर हे ओखर रूप मनोहर का कहिबे ।

चिटक भर म होइस परमपिता के ऊंहला भान,
नाना भांति ले करे लगिन ऊंखर यशोगान ।

तुहीमन सृष्टि के करइवा अव जम्मो जीव के देखइया अव,
धरती के भार हरइया अव जीवन नइया के खेवइया अव ।

मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान,
बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान ।

प्रगटे आज तो भगवान मंगल गाओं,
खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं ।



भादो के महीना, घटा छाये अंधियारी,
बड़ डरावना हे, ये रात कारी कारी ।

कंस के कारागार, बड़ रहिन पहेरेदार,
चारो कोती चमुन्दा, खुल्ला नईये एकोद्वार ।

देवकी वासुदेव पुकारे हे दीनानाथ,
अब दुख सहावत नइये करलव सनाथ ।

एक एक करके छैय लइका मारे कंस,
सातवइया घला होगे कइसे अपभ्रंस ।

आठवईंया के हे बारी कइसे करव तइयारी,
ऐखरे बर होय हे आकाषवाणी हे खरारी ।

मन खिलखिवत हे फेर थोकिन डर्रावत हे,
कंस के काल हे के पहिली कस एखरो हाल हे ।

ओही समय चमके बिजली घटाटोप,
निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप ।

बिजली अतका के जम्मो के आंखी कान मुंदागे,
दमकत बदन चमकत मुकुट चार हाथ वाले आगे ।

देवकी वासुदेव के हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे,
जम्मो पहरेदारमन ल बड़ जोर के निदं आगे ।

देखत हे देवकी वासुदेव त देखत रहिगे,
कतका सुघ्घर हे ओखर रूप मनोहर का कहिबे ।

चिटक भर म होइस परमपिता के ऊंहला भान,
नाना भांति ले करे लगिन ऊंखर यशोगान ।

तुहीमन सृष्टि के करइवा अव जम्मो जीव के देखइया अव,
धरती के भार हरइया अव जीवन नइया के खेवइया अव ।

मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान,
बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान ।

प्रगटे आज तो भगवान मंगल गाओं,
खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओं ।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

देश बर हम तो जियन



ये हमर तो देश संगी, घात सुघ्घर ठांव हे ।
हे हिमालय हा मुकुट कस, धोय सागर पांव हे ।
फूल बगिया के बने हे, वेष भाषा सब धरम ।
एक गठरी कस हवन हम, ये हमर आवय मरम ।।

देश गांधी के पुजारी, हे अराधक शांति के ।
बोस नेताजी कहाथे, देवता नव क्रांति के ।।
हे भगत शेखर सरीखे, वीर बलिदानी हमर ।
जूझ के होगे समर मा, जेन मन हा तो अमर ।।

खून कतका के गिरे हे, देश के पावन चरण ।
तब मिले हे मुक्ति हमला, आज ओखर याद करन ।।
सोच ऊखर होय पूरा, काम अइसन हम करन ।
भेट होही गा बड़े ये, देश बर हम तो जियन ।।

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

दांव मा लगगे पानी



पानी नदियां मा बढ़े, कइसे जाबो पार ।
भीड़ भरे हे घाट मा, कहां हे डोंगहार ।।
कहां हे डोंगहार, जेन हा खेवय डोंगा ।
रिमझिम हे बरसात, मुड़ी मा छाता चोंगा ।
जाना बहिनी गांव, तीज बर जोहे रानी ।
‘रमेष‘ करत विचार, दांव मा लगगे पानी ।।


- रमेशकुमार सिंह चौहान

ददा (कुण्ड़लिया छंद)


रूखवा जइसे बन ददा, देथे हमला ठांव ।
हमरे बर फूलय फरय, देत मया के छांव ।।
देत मया के छांव, जान के लगाय बाजी ।
कमाय जांगर टोर, हमर हर बाते राजी ।।
कह ‘रमेश‘ मन लाय, ददा मोरे बड़ सुखवा ।
बने रहय छतनार, ददा मोरे जस रूखवा ।।

- रमेशकुमार सिंह चौहान

रविवार, 3 अगस्त 2014

तांका


1.
जेन बोलय
छत्तीसगढ़ी बोली
अड़हा मन
ओला अड़हा कहय
मरम नई जाने ।
2.
सावन भादो
तन मा आगी लगे
गे तै मइके
पहिली तीजा पोरा
दिल मा मया बारे
3.
बादर कारी
नाचत छमाछम
बरखा रानी
बरसे झमाझाम
सावन के महिना
4.
स्कूल तै जाबे
घातेच मजा पाबे
आनी बानी के
पढ़बे अऊ खाबे
सपना तै सजाबे