शनिवार, 28 मई 2016

सुरूज के आभा

नकल के माहिर ह, नकल करय जब,
झूठ लबारी ह घला, कहा जथे असली ।
सोन पानी के चलन, होथे अब्बड़ भरम,
चिन्हावय न असल, लगथे ग नकली ।।
हीरा ह लदकाये हे, रेती के ओ कुड़ुवा मा,
येला जाने हवे वोही, जेन होथे जौहरी ।
करिया बादर तोपे, सच के सुरूज जब,
सुरूज के आभा दिखे, बादर के पौतरी ।