बुधवार, 22 जून 2016

दोहावली

जीयत भर खाये हवन, अपन देश के नून ।
छूटे बर कर्जा अपन, दांव लगाबो खून ।।

जीवन चक्का जाम हे, डार हॅसी के तेल ।
सुख-दुख हे दिन रात कस, हॅसी-खुशी ले झेल ।।

चल ना गोई खाय बर, चुर गे हे ना भात ।
रांधे हंव मैं मुनगा बरी, जेला तैं हा खात ।।

महर महर ममहात हे, चुरे राहेर दार ।
खाव पेट भर भात जी, घीव दार मा डार ।।

परोसीन हा पूछथे, रांधे हस का साग ।
हमर गांव के ये चलन, रखे मया ला पाग ।।

दाई ढाकय मुड़ अपन, देखत अपने जेठ ।
धरे हवय संस्कार ला, हे देहाती ठेठ ।।

खेती-पाती बीजहा, लेवव संगी काढ़ ।
करिया बादर छाय हे, आगे हवय असाढ़ ।।

बइठे पानी तीर मा, टेर करय भिंदोल ।
अगन-मगन बरसात मा, बोलय अंतस खोल ।।

बइला नांगर फांद के, जोतय किसान खेत ।
टुकना मा धर बीजहा,  बावत करय सचेत ।।

मुंधरहा ले जाग के, जावय खेत किसान ।
हॅसी-खुशी बावत करत, छिछत हवय गा धान ।।

झम झम बिजली हा करय, करिया बादर घूप ।
कारी चुन्दी बगराय हे, धरे परी के रूप ।।

आज काल के छोकरा, एती तेती ताक ।
अपन गांव परिवार के, काट खाय हे नाक ।।

मोरे बेटा कोढ़िया, घूमत मारय शान ।
काम-बुता के गोठ ला, एको धरय न कान ।।

जानय न घाम थोरको, बइठे रहिथे छाॅंव ।
बेटा मोर किसान के, खेत धरय ना पाॅंव ।।

चल चल बेटा खेत मा, देबे मोला साथ ।
बुता सिखा हूॅं आज मैं, धर के तोरे हाथ ।।