सोमवार, 25 जुलाई 2016

बरस बरस ओ बरखा रानी

धान पान के सुघ्घर बिरवा, लइका जस हरषाावय ।
जब सावन के बरखा दाई, गोरस अपन पियावय ।

ठुमुक ठुमुक लइका कस रेंगय, धान पान के बिरवा ।
लहर लहर हवा संग खेलय, जइसे लइका हिरवा ।।

खेत खार हे हरियर हरियर, हरियर हरियर परिया ।
झरर झरर जब बरसे पानी, भरे लबालब तरिया ।।

नदिया नरवा छमछम नाचय, गीत मेचका गावय ।
राग झिुंगुरा छेड़े हावय, रूखवा ताल मिलावय ।।

भरे भरे हे बारी बखरी, नार बियारे छाये ।
तुमा कोहड़ा छानही चढ़य, भाजी पाला लाये ।।

जानय नही महल वाले हा, कइसे गिरते पानी ।
गरीबहा मन के जिनगी के, कइसन राम कहानी ।।

घात डहे हवय बेंदरा हा, परवा खपरा फोरे ।
कूद कूद के नाचत रहिथे, कभू न रेंगे कोरे ।।

झरे ओरवाती झिमिर झिमिर, घर कुरिया बड़ चूहे ।
हवय गाय कोठा मा पानी, तभो पहटिया दूहे ।।

परछी अॅंगना एके लागे, ओधे भले झिपारी ।
घर कुरिया हे तरई आंजन, सिढ़ ले परे किनारी ।।

मन के पीरा मन मा राखे, गावय गीत ददरिया ।
बरस बरस ओ बरखा रानी, बरसव बादर करिया ।।

दाई परसे मेघा बरसे, तभे पेट हा भरथे ।
कभू कहूं ओ गुस्सा होवय, सबके जियरा जरथे ।।