गुरुवार, 10 नवंबर 2016

डूब मया के दहरा

पैरी चुप हे साटी चुप हे, मुक्का हे करधनिया ।
चूरी चुप हे झुमका चुप हे, बोलय नही सजनिया ।।

दग-दग ले उज्जर तरपौरी,  चुक-चुक ले हे एड़ी ।
बिरबिट-बिरबिट लाल महुर के, तोड़े हावे बेड़ी ।।
घुठुवा बैरी पैरी छोड़े, रेषम डोरी बांधे ।
छोटे-छोटे चुन्दी राखे, केष घटा ना छांदे ।।
सोलह अँग ले आरूग हावय, जइसे नवा बिहनिया

आंखी ले तो भाखा फूटय, जस सागर के लहरा ।
उबुक-चुबुक हे मोरे आंखी, डूब मया के दहरा ।।
लाख चॅंदैनी बादर होथे, तभो कुलुप अॅधियारे ।
चंदा एक सरग ले निकलय, जीव म जीव ल डारे ।।
जोही बर के छांव जनाथे, जिनगी के मझनिया