मंगलवार, 21 मार्च 2017

मदिरा सवैया

रूप न रंग न नाम हवे कुछु, फेर बसे हर रंग म हे ।
रूप बने न कभू बिन ओखर, ओ सबके संग म हे ।।
नाम अनेक भले कहिथे जग, ईश्वर फेर अनाम हवे ।
केवल मंदिर मस्जिद मा नहि, ओ हर तो हर धाम हवे ।।