सोमवार, 1 मई 2017

मोर ददा के छठ्ठी हे

मोर ददा के छठ्ठी हे,
नेवता हे झारा-झारा

कथा के साधु बनिया जइसे
मोर बबा बिसरावत गे
आजे-काले करहू कहि-कहि
ददा के छठ्ठी भूलावत गे

सपना बबा ह देखत रहिगे
टूटगे जीनगी के तारा

नवा जमाना के नवा चलन हे
बाबू मोरे मानव
मोर जीनगी ये सपना ल
अपने तुमन जानव

घेरी-घेरी सपना म आके
बबा गोठ करय पिआरा

बबा के सपना मैं ह एक दिन
ददा ले जाके कहेंव
ददा के मुह ल ताकत-ताकत
उत्तर जोहत रहेंव

सन खाये पटुवा म अभरे
चेहरा म बजगे बारा

बड़ सोच-बिचार के ददा
मुच-मुच बड़ हाँसिस
मुड़ डोलावत-डोलवत
बबा के सपना म फासिस

पुरखा के सपना पूरा करव
बेटा मोर दुलारा

छै दिन के छठ्ठी ह जब
होथे महिनो बाद
पचास बसर के लइका होके
देखंव येखर स्वाद

छठ्ठी के काय रखे हे
जब जागव भिनसारा