बुधवार, 30 अगस्त 2017

हे गणनायक

हे गणनायक देव गजानन
(मत्तगयंद सवैया)

हे गणनायक देव गजानन
राखव राखव लाज ल मोरे ।
ये जग मा सबले पहिली प्रभु
भक्तन लेवन नाम ल तोरे ।
तोर ददा शिव शंकर आवय
आवय तोर उमा महतारी ।।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।

राखय शर्त जभे शिवशंकर
अव्वल घूमय सृष्टि ल जेने ।
देवन मा सबले पहिली अब
देवन नायक होहय तेने ।।
अव्वल फेर करे ठहरे प्रभु
सृष्टिच मान ददा महतारी ।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।।

काम बुता शुरूवात करे बर
होवय तोर गजानन पूजा ।
मेटस भक्तन के सब विध्न ल
विघ्नविनाशक हे नहि दूजा ।।
बुद्धि बने हमला प्रभु देवव
हो मनखे हन मूरख भारी ।
कोन इहां तुहरे गुण गावय
हे महिमा जग मा बड़ भारी ।

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

तीजा

 मत्तगयंद सवैया

हे चहके बहिनी चिरई कस
हॉसत गावत मानत तीजा ।
सोंध लगे मइके भुइया बड़
झोर भरे दरमी कस बीजा ।।
ये करु भात ह मीठ जनावय
डार मया परुसे जब दाई ।
लाय मयारु ददा लुगरा जब
छांटत देखत हाँसय भाई ।।

तीजा-पोरा

आवत रहिथन मइके कतको, मिलय न एक सहेली ।
तीजा-पोरा के मौका मा, आथे सब बरपेली ।।

ओही अँगना ओही चौरा, खोर-गली हे ओही ।
आय हवय सब सखी सहेली, लइकापन ला बोही ।

हमर नानपन के सुरता ला, धरे हवन हम ओली ।
तीजा-पोरा मा जुरिया के, करबो हँसी ठिठोली ।।

तरिया नरवा घाट घठौंदा, जुरमिल के हम जाबो ।
जिनगी के चिंता ला छोड़े, लइका कस सुख पाबो ।।

अपन-अपन सुख दुख ला हेरत, हरहिंछा बतियाबो ।
तीजा-पोरा संगे रहिके, अपन-अपन घर जाबो ।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान

नदिया छेके नरवा छेके, छेके हस गउठान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

डहर गली अउ परिया छेके, छेके सड़क कछार ।
कुँवा बावली तरिया पाटे, पाटे नरवा पार ।।
ऊँचा-ऊँचा महल बना के, मारत हवस शान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

रूखवा काटे जंगल काटे, काटे हवस पहाड़ ।
अपन सुवारथ सब काम करे, धरती करे कबाड़ ।।
बारी-बखरी धनहा बेचे, खोले हवस दुकान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

गिट्टी पथरा अँगना रोपे, रोपे हस टाइल्स ।
धरती के पानी ला रोके, मारत हस स्टाइल्स ।।
बोर खने हस बड़का-बड़का, पाबो कहिके मान ।
पानी पानी अब चिहरत हस, सुनय कहां भगवान ।।

कइसे जी भगवान

जर भुंजा गे खेत मा, बोये हमरे धान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
तरसत हन हम बूंद बर, धरती गे हे सूख ।
बरस आय ये तीसरा, पीयासे हे रूख ।।
ठोम्हा भर पानी नही, कइसे रखब परान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
खेत-खार पटपर परे, फूटे हवय दरार ।
नदिया तरिया नल कुँवा, सुख्खा हावे झार ।।
हउला बाल्टी डेचकी, मूंदे आँखी कान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।
बादर होगे दोगला, मनखे जइसे आज ।
चीं-ची चिरई मन कहय, पापी मन के राज ।।
मनखे हावय लालची, बेजाकब्जा तान ।
तन लेसागे हे हमर, कइसे जी भगवान ।।

हे जीवन दानी, दे-दे पानी

हे करिया बादर, बिसरे काबर, तै बरसे बर पानी ।
करे दुवा भेदी, घटा सफेदी, होके जीवन दानी ।।
कहूं हवय पूरा, पटके धूरा, इहां परे पटपर हे ।
तरसत हे प्राणी, मांगत पानी, कहां इहां नटवर हे ।।

हे जीवन दानी, दे-दे पानी, अब हम जीबो कइसे ।
धरती के छाती, खेती-पाती, तरसे मछरी जइसे ।।
पीये बर पानी, आँखी कानी, खोजय चारो कोती ।
बोर कुँआ तरिया, होगे परिया,  कहां बूंद भर मोती ।।

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

भारत भुईंया रोवत हे

आजादी के माला जपत
काबर उलम्बा होवत हे

एक रूख के थांघा होके,
अलग-अलग डोलत हे
एक गीत के सुर-ताल मा,
अलगे बोली बोलत हे

देश भक्ति के होली भूंज के
होरा कस खोवत हे

विरोध करे के नाम म
मूंदें हे आँखी-कान
अपने देष ला गारी देके
मारत हावय शान

राजनीति के गुस्सा ला
देशद्रोह म धोवत हे

अपन अधिकार बर घेरी-घेरी
जेन हा नगाड़ा ढोकय
कर्तव्य करे के पारी मा
डफली ला घला रोकय

आजादी के निरमल पानी मा
जहर-महुरा घोरत हे

गांव के गली परीया
कतका झन मन छेके हे
देश गांव के विकास के रद्दा
कतका झन मन रोके हे

अइसन लइका ला देख-देख
भारत भुईंया रोवत हे