घाट सुन्ना बाट सुन्ना, खार सुन्ना गांव मा । झांझ झोला झेल झर झर, छांव मिलय न छांव मा ।। गाय गरूवा होय मछरी, रोय तड़पत पार मा । आदमी बेहाल होगे, घाम के ये मार मा ।। बूॅंद भर पानी नई हे, बोर नल सुख्खा परे । ओ कुॅआ अउ बावली हा, का पता कबके मरे । छोड़ मनखे गोठ तैं हर,जीव जोनी ले तरय । पेड़ रूख के जर घला हा, भोमरा मा जर मरय ।
एक लघु कथा:जिंदगी, गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारी
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जिंदगी, गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारी — डॉ. अर्जुन दुबे यह एक सच्ची घटना पर
आधारित छोटी-सी कहानी है। यह उस महिला के जीवन का चित्र है जिसे मैं पिछले
आठ–नौ…
1 हफ़्ते पहले