गंवा गे जी गांव, कहूं देखे हव का गा । बइठे कोनो मेर, मुड़ी मा बांधे पागा ।। खोंचे चोंगी कान, गोरसी तापत होही । मेझा देवत ताव, देख इतरावत होही ।।1।। कहां खदर के छांव, कहां हे पटाव कुरिया । ओ परछी रेंगान, कहां हे ठेकी चरिया ।। मूसर काड़ी मेर, हवय का संगी बहना । छरत टोसकत धान, सुनव गा दाई कहना ।।2।। टोड़ा पहिरे गोड़, बाह मा हे गा बहुटा । कनिहा करधन लोर, सूतिया पहिरे टोटा ।। सुघ्घर खिनवा ढार, कान मा पहिरे होही । अपने लुगरा छोर, मुडी ला ढाॅंके होही ।।3।। पिठ्ठुल छू छूवाल, गली का खेलय लइका । ओधा बेधा मेर, लुकावत पाछू फइका ।। चर्रा खुड़वा खेल, कहूं का खेलय संगी । उघरा उघरा होय, नई तो पहिरे बंडी ।।4।। घर मोहाटी देख, हवय लोहाटी तारा । गे ...
विभीषण की प्रासंगिकता मेरे दृष्टिकोण में-डॉ. अर्जुन दुबे
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विभीषण की प्रासंगिकता: “घर का भेदी” या सत्य का साहसी स्वर? भारतीय जनमानस
में एक कहावत बहुत प्रचलित है—“घर का भेदी लंका ढाहे।” यह कहावत प्रायः विभीषण
के संद...
2 दिन पहले