मनमोहन छंद मनखे के हे, एक धरम । मनखे बर सब, करय करम मनखे के पहिचान बनय । मनखेपन बर, सबो तनय दूसर के दुख दरद हरय । ओखर मुड़ मा, सुख ल भरय सुख के रद्दा, अपन गढ़य । भव सागर ला पार करय मनखे तन हे, बड़ दुरलभ । मनखे मनखे गोठ धरब करम सार हे, नषवर जग । मनखे, मनखे ला झन ठग जेन ह जइसन, करम करय । तइसन ओखर, भाग भरय सुख के बीजा म सुख फरय । दुख के बीजा ह दुख भरय मनखे तन ला राम धरय । मनखे मन बर, चरित करय सब रिश्ता के काम करय । दूसर के सब, पीर हरय -रमेश चौहान
एक राजर्षि की मूर्त कल्पना है शाहजहांपुर की पब्लिक लाइब्रेरी-प्रो रवीन्द्र
प्रताप सिंह
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तकनीकी क्रांति के इस दौर में जब सब कुछ डिजिटल माध्यमों पर सिमटता जा रहा है,
तब भी किताबों का आकर्षण और महत्व कम नहीं हुआ है। किताबें केवल शब्दों…
1 हफ़्ते पहले