शुक्रवार, 29 मई 2015

एक अकेला आय तै

एक अकेला आय तै, जाबे तै हर एक ।
का गवाय का पाय हस, ध्यान लगा के देख ।
ध्यान लगा के देख, करे काखर हस तै जै ।
मनखे चोला पाय, बने हस का मनखे तै ।।
मनखेपन भगवान, जेन हा लगय झमेला ।
पूजे का भगवान, होय तै एक अकेला ।।
-रमेश चौहान

गुरुवार, 28 मई 2015

रद्दा रेंगत जाव रे

रद्दा रेंगत जाव रे, रेंगे से हे काम ।
चाहे बाधा लाख रहय, कर झन तै आराम ।।
कर झन तै आराम, मिलत ले अपने मंजिल ।
नदिया नरवा देख, टोर बाधा हे संदिल ।।
चाटी चढ़य पहाड़, देख तो ओखर माद्दा।
तै तो दिमागदार, छोड़थस काबर रद्दा ।।

-रमेश चौहान

मया हंव मै तोर

डारा पाना डोल के, कहय हवा ले बात ।
मोरे डोले तै बहे, कहां तोर अवकात ।।
कहां तोर अवकात, बिना मोरे का पुरवाही ।
रहंव जब खामोस, कोन तोला रे भाही ।।
हवा पूछय मनात, चढे काबर हे पारा ।
मया हंव मै तोर, तहीं जोही अस डारा ।।
-रमेश चौहान

कोदू राम ‘दलित‘

लइका रामभरोस के, टिकरी जेखर गांव ।
छत्तीसगढि़या जन कवि,‘कोदू‘ ओखर नाव ।।
‘कोदू‘ ओखर नाव, जेन हर‘दलित‘ कहाये ।
ओखर कुंडलि छंद, आज ले गजब सुहाये।।
जन मन के तकलीफ, लिखे हे जेन ह ठउका ।
हवय अरूण हेमंत, बने ओखर दू लइका ।।

कोदू राम ‘दलित‘ हमर, कहाय माटी पूत ।
जन मन पीरा जे बुने, जइसे बुनथे सूत ।।
जइसे बुनथे सूत, बुने हे दोहा कुंडलि ।
दोहा पारय खूब, गांव के राउत मंडलि ।।
गोठ कहे हे पोठ, छोड़ के बदरा-बोदू ।
जन जन हा चिल्लाय, अमर रहिहव गा कोदू ।।

हमर नवागढ़ गांव के, कालेज हवय शान ।
कोदू राम ‘दलित‘ हवय, जेखर सुघ्घर नाव ।।
जेखर सुघ्घर नाव, गांव मा अलख जगाये ।
सिक्छा के परभाव, सबो कोती बगराये ।।
करे ‘दलित‘  कस काम, दबे कुचले बर अढ़बढ़ ।
लइका लइका आज, पढ़े हे हमर नवागढ़ ।।

बुधवार, 27 मई 2015

बिलवा कइसे होय

भाथें अपने काम ला, मनखे नेता होय ।
मान विरोधी आन ला, काहेक के बिट्टोय ।।
काहेक के बिट्टोय, अंगरी देखा देखा ।
कोनो कहां बताय, काम के लेखा जोखा ।।
अपने आंखी मूंद, लाल ला पियर बताथें ।
कइसनो कर डार, काम ला अपने भाथें ।।

खुरसी के ओ रंग ले, रंग जथे सब कोय ।
सादा तो ओ हर रहय, बिलवा कइसे होय ।।
बिलवा कइसे होय, समझ तो सकय न कोनो ।
बइठे म लगय एक, शेर अउ सियार दूनो  ।।
चिन्हय संगी कोन, बने काखर हे करसी ।
डोल सकय मत जेन, रखे मा अइसन खुरसी ।।

मंगलवार, 26 मई 2015

जुन्ना पारा गांव के

जुन्ना पारा गांव के, धंधाय हवय आज ।
बेजाकब्जा के हवय, खोर गली मा राज ।।
खोर गली मा राज, गांव के दुश्मन मन के ।
अपन गुजारा देख, गली छेके हे तन के ।।
कहत हवे ग ‘रमेश‘, बात ला थोकिन गुन्ना ।
चातर कर दे खोर, नीक लगही गा जुन्ना ।।

सोमवार, 25 मई 2015

सुरता झीरम कांड के

सुरता झीरम कांड के, ताजा होगे आज ।
जेमा हारे तो रहिन, लोकतंत्र के राज ।।
लोकतंत्र के राज, शहीद होइन गा नेता ।
समय कठिन गे बीत, धरे मुठ्ठी मा रेता ।।
ताजा हे वो घाव, बचे हे अब तक क्रुरता ।
कइसे होही नाश, जाय कइसे ओ सुरता ।।

जागव जागव अब बस्तरिहा

जागव जागव अब बस्तरिहा, लावव संगी नवा बिहान ।
तोर छोड़ के कोनो ऊंहा, कर सकय न थोरको निदान ।।

तपत हवे तूहरे भरोसा, तू ही मन ला ढाल बनाय ।
तू ही मन ला मार मार के, तू ही मन ला खूब डराय ।।

धरे बम्म अउ गोला बारूद, लूटे तोरे तीर कमान ।
जंगल मा ओ कब्जा करके, लूटत हे तोरे पहिचान ।।

काट-काट विकास के रद्दा, जंगल राखे तोला धांध ।
देख सकव झन जग हे कइसे, राखे खूंटा तोला बांध ।।

अपन आप ला मितान कहिके, तोरे गरदन देथे घोठ ।
तोरे बर ओ बनाय फांदा, जीभ निकाले करथे गोठ ।।

एक-एक तो ग्यारा होथे, देखव तुम सब हाथ मिलाय
हो जव लकडी के गठरी कस, गांठ मया के देव लगाय ।

खोल सरग तक अपने पांखी, उड जावव न फांदा समेत ।
कब तक तू मन सूते रहिहव, अब तो हो जावव ग सचेत ।।

जंगल के तू ही मन राजा, भालू चीता षेर हराय ।
बैरी सियार मन ला काबर, अब तू मन रहिथव डरराय ।


दम भर दहाड तै जंगल मा, डारा पाना सुन के झर जाय ।
सियार सुन के दहाड़ तोरे, जिहां रहय ऊंहे मर जाय ।।

रविवार, 24 मई 2015

कोन हा दुख ला सहिथे

कहिथे सब सरकार के, हवय न ऐमा दोष ।
जेन ल देखव तेन हा, उतारत हवे रोष।।
उतारत हवे रोष, कहे ला करत नई हे ।
सपना के ओ गोठ, थोरको भरत नई हे ।।
पूछत हवे ‘रमेश‘, कोन हा दुख ला सहिथे ।
सपना देखय जेन, सबो झन येही कहिथे ।।

भरय नही गा पेट हा

भरय नही गा पेट हा, होय मा कलमकार ।
कलाकार ला कोन हा, देथे पइसा चार ।।
देथे पइसा चार, कोन हर गा इज्जत ले ।
बिधुन अपनेच काम, मस्त हे बेइज्जत ले ।।
डौकी लइका रोय, कोडि़हा कहय सही गा ।
कविता लिख गा गीत, पेट हा भरय नही गा ।।

सबो फिक्स हे खेल मा

कतको तै हर कूद ले, नइ चलय तोर दांव ।
सबो फिक्स हे खेल मा, फिक्स हवय हर नाव ।।
फिक्स हवय हर नाव, सलेक्सन काखर होही ।
खुल-खुल हॅसही कोन, कोन माथा धर रोही ।।
हे सरकारी काम, तुमन जादा झन भटको ।
भीड़ा अपन जुगाड़, इहां मिलही रे कतको ।।
-रमेश चौहान

शनिवार, 23 मई 2015

करत अकेल्ला काम

कइसे करबे काम ला, देखत हे संसार ।
तही अकेल्ला शेर हस, बाकी सबो सियार ।।
बाकी सबो सियार, शेर के लइका होके ।
भुलाय अपन सुभाव, लुकावत हे रो रो के ।।
हर मुखिया के हाल, हवय रे कुछ तो अइसे ।
करत अकेल्ला काम, काम होवय रे कइसे ।।

घाम जेठ के घात हे

घाम जेठ के घात हे, रद्दा जाके जांच ।
कान नाक मुॅह तोप के, झोला ले तै बाच ।।
झोला ले तै बाच, गोंदली जेब धरे रह ।
अदर-कचर झन बोज, भूख ला थोकिन तै सह ।।
मुॅह झन तोर सुखाय, थिरा ले छांव बेठ के ।
हरर-हरर हे घात, आज तो घाम जेठ के ।।
-रमेश चौहान

शुक्रवार, 22 मई 2015

मया ले सनाय दिल गा

मिरगा कस खोजत हवस, गांव गली अउ खोर ।
कसतूरी कस हे मया, समाय भीतर तोर ।।
समाय भीतर तोर, मया ला पाके उपजे ।
रगड़ होय जब बांस, बास मा आगी सिरजे ।।
महर महर ममहाय, मया ले सनाय दिल गा ।
खूब कूदत नाचत, पाय ओ मयारू मिरगा ।।

रहव मत बइठे-बइठे

बइठे-बइठे कोन हा,देही हमला खाय ।
कोन कहय पर ला इहां, अपने हा चिल्लाय ।।
अपने हा चिल्लाय, वाह रे जांगर चोट्टा ।
चुहक-चुहक के खून, जोंख  कस होगे रोठ्ठा ।
कह ‘रमेश‘ कविराय, जगत हे अइठे-अइठे ।।
हाथ-गोड़ ला पाय, रहव मत बइठे-बइठे ।।

जरे काहेेक भोमरा

जरे काहेेक भोमरा, झरे काहेक झांझ ।
छोड़ मझनिया के हरर, जरे जेठ के सांझ ।।
जरे जेठ के सांझ, ताव आगी भठ्ठी कस ।
हाथ-गोड़ मुॅह-नाक, होय भाजी-पाला जस ।।
कइसन के अइलाय, भाप कस जब हवा झरे ।
लेसावत हे देह, ओनहा हर घला जरे ।।
-रमेश चौहान

मंगलवार, 19 मई 2015

मोरे घर के हाल ला

मोरे घर के हाल ला, कोन ला का बतांव ।
झूठ लबारी बोल के, अपने ला भरमांव ।।
अपने ला भरमांव, मूंद के अपने आंखी ।
लइका मन के आज, जाग गे हे गा पांखी ।।
बतावत आत लाज, मोर बर बरकस छोरे ।
गारी-गल्ला देत, रात दिन बेटा मोरे ।।

तभो ददा हा, समझाथे

जेखरे भरोसा, पांच परोसा, तीनो बेरा, ओ खाथे ।
सुत उठ बिहनिया, खरे मझनिया, रात बियारी, धमकाथे ।
घर बइठे बइठे, काबर अइठे, अपन रौब ला, देखाथे ।
ददा ला ना भावय, ना डररावय, तभो ददा हा, समझाथे ।।

बेटा बातें सुन, थोकिन तै गुन, अपने जीवन, तै गढ़ ना ।
दुनिया इक मेला, पड़ न झमेला, रद्दा आघू , तै बढ़ ना ।।
हे गा पूछारी, सबो दुवारी, काम बुता ला, जे जाने ।
सुन बेटा हमार, हवय दरकार, अपने हिम्मत, जे माने ।।

हे तोरे अंदर, एक समुंदर, जेला तोला, हे मथना ।
जब खुदे कमाबे, अमृत ल पाबे, जेला तोला, हे चखना ।।
अपने बांटा धर, लालच झन कर, देखा-देखी, दुनिया के ।
बात मान अतके, झन रह सपटे, बन जाबे तै, गुनिया के ।।

लाल होगे हे जंगल

जंगल झाड़ी तोर हे, रूख राई हर तोर ।
मनखे मनखे तोर हे,काबर मचाय शोर ।।
काबर मचाय शोर, धरे बंदूक खांध मा ।
सिधवा ला बहकाय, घूसरे हवस मांद मा ।।
तहीं बरोबर सोच, होहि कइसे गा मंगल ।
कब तक पीबे खून, लाल होगे हे जंगल ।

कान्हा बंशी जब फुके

कान्हा बंशी जब फुके, झरे झमा झम राग ।
चेतन मा कोने कहय, जड़ मा जागे अनुराग ।।
जड़ मा जागे अनुराग, होय राधा कस माटी ।
धुर्रा बने उडाय, छुये कान्हा के साटी ।।
ब्रज के ठुठवा पेड़, राग सुन होगे नान्हा । नान्हा-नानचुक
घाट-बाट चिल्लाय, अरे ओ कान्हा-कान्हा ।।

सोमवार, 18 मई 2015

जीवन मा अनमोल

जीवन मा अनमोल हे, दाई ददा हमार ।
जेखर ले तन हा मिले, मिले हवय संसार ।।
मिले हवय संसार, जिहां हे एक खजाना ।
कठिन डगर हे फेर, जिहां मुश्किल हे जाना ।।
मुश्किल करे असान, हमर बर बन संजीवन।
कदम कदम रेंगाय, बतावत अपने जीवन ।।
-रमेश चौहान

आखर ला परघाय

आखर आखर शब्द ला, पहिली ले परघाय ।
रचंव कुंडलि छंद मैं, गजानन मन बसाय ।
गजानन मन बसाय, देवता जे आखर के ।
अलंकार रस छंद, रूप आवय शारद के ।।
पाव पखार ‘रमेश‘, पाव मा लय हे ओखर ।
हे शारदे गणेश, दौव मोला तुम आखर ।।

गोरी सुरता तोर ओ

गोरी सुरता तोर ओ, हरे निंद अउ भूख ।
तोर अगोरा मैं खड़े, ठाड़े जइसे रूख ।।
ठाड़े जइसे रूख, रात दिन अपन ठिकाना ।
चातक मैं होगेंव, बूॅंद स्वाती बन आना ।
हिरदय नइ हे देह, करे हस ऐखर चोरी ।
हवे अगोरा तोर, करेजा बन आ गोरी ।।

-रमेश चौहान
मिश्रापारा, नवागढ
जिला-बेमेतरा
09977069545

रविवार, 17 मई 2015

मया नई होतीस

सोचव ये जग मा कहूं, मया नई होतीस ।
कोन जगत मा सृष्टि के, बीजा ला बोतीस ।।
बीजा ला बोतीस, कोन सुख-दुख के जग मा।
दिल पथरा होतीस, पीर होतीस न रग मा ।।
कहितीस फेर कोन, खुशी ला अपने खोजव ।
होतिस का भगवान, मया बिन जग मा सोचव ।।

रहिबो रे दिन चार

दुनिया मा संगी हमन, रहिबो रे दिन चार ।
भरोसा देह के हे कहां, जानय ना संसार ।।
जानय ना संसार, जगत कब आही जाही ।
अमर हवय रे प्रान, चेंदरा आने भाही ।।
जाही इक दिन छोड़, देह के ओ तो रनिया ।
राही जग के आन, छोड़ जाबो हम दुनिया ।।
-रमेश चौहान

सच के रद्दा रेंग

चारी चुगली छोड़ के, चिंतन कर तै सार ।
झूठ लबारी के हवय, दुनिया मा दिन चार ।।
दुनिया मा दिन चार, असत के राज दिखथे ।
सच हर देर-सबेर, अपन गाथा ला लिखथे ।।
सोच ला कर सजोर, नही ता परही भारी ।
सच के रद्दा रेंग, छोड़ के चुगली-चारी ।।

-रमेश चौहान

शनिवार, 16 मई 2015

हमू ला उत्तर चाही

चाही पइसा अउ पहुॅच, कराय बर कुछु काम ।
मेहनत भरोसा कहां, होय कोखरो नाम ।।
होय कोखरो नाम, मेहनत संग पहुॅच ले ।
जन जन गेहें जान, कोन हर खाते गुप ले ।।
एक काम के दाम, बराबर कोन लगाही ।
हमरो सवाल खास, हमू ला उत्तर चाही ।।

लिख-लिख कवि मरय

कविता लिख-लिख कवि मरय, पढ़य सुनय ना कोय ।
करय मसखरी जेन हा, ऊही हर अब कवि होय ।।
ऊही हर अब कवि होय, भाय जेला तो जनता ।
सुना चुटकिला गोठ, देख कइसे कवि बनता ।।
छंद मत लिख ‘रमेश‘, करा झन ऐखर फधिता ।
दिखय न कोनो मेर, जेन ला भाये कविता ।।

बुधवार, 13 मई 2015

जाय बर हे मरघटिया

मरघटिया के पार मा, गोठ करंय सियान ।
कइसन खीरत जात हे, बने बने इंसान ।।
बने बने इंसान, दिखय ना अब दुनिया ।
मनखे मन मा आज, सुवारथ के बैगुनिया ।।
कर पर काज ‘रमेश‘, बने मत रह तै घटिया ।
आज नही ता काल, जाय बर हे मरघटिया ।।

मंगलवार, 12 मई 2015

मया के ए बैगुनिया

दुनिया कहिथे गा भला, सब संग करव प्यार ।
प्यार करे जाथे कहां, हो जाथे ना प्यार ।।
हो जाथे ना प्यार, जवानी मा सब कहिथे ।
काबर फेर जवान, प्यार ला खोजत रहिथे ।।
अपनेपन के भाव, मया के ए बैगुनिया ।
रहिथे जेखर संग, मया तो करथे दुनिया ।।

‘‘दाई-दिन‘ (मातृदिवस)

दाई कहि हारे कहां, ओखर कोरा खेल ।
जब ले जवान तै बने, अचरा दे हस मेल ।।
अचरा दे हस मेल, अपन दाई ल भुलाके ।
माने ना तै बात, रहे घर अलग बसाके ।।
करे हस तार-तार, बात तै मान लुगाई ।
‘‘दाई-दिन‘ मा आज, गोहरावत हस दाई ।।

गीत-"कहां मनखें गंवागे"

दिखय न कोनो मेर, हवय के नाव बुतागे
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।
दिखय न कोनो मेर, हवय के नाव बुतागे
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

जंगल झाड़ी खार, डोंगरी मा जा जाके ।
सहर सहर हर गांव, गीत ला गा गाके ।।
इहां उहां अब खोज, मुड़ी हा मोर पिरागे ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

रद्दा म मिलय जेन, तीर ओखर जा जा के ।
करेंव मैं फरियाद, आंसु ला ढरा ढरा के  ।
जेला मैं पूछेंव, ओखरे मति ह हरागे  ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

गरीब गुरबा संग, रहय ओ मन ल लगा के ।
पोछय ओखर आॅसु, संगवारी अपन बना के
अइसन हमर  मितान, हमर ले घात रिसागे ।।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

ऊॅच-नीच के भेद, मिटाये मया जगा के ।
मेटे झगड़ा पंथ, खुदा ला एक बता के ।।
ले मनखेपन संत, जगत ले कती हरागे ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

दरद मा दरद जान, रखय ओ अपन बनाके ।
हेरय पीरा बान, जेन हर हॅसा हॅसा के ।।
ओखर ओ पहिचान, संग ओखरे सिरागे ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

दिखय न कोनो मेर, हवय के नाव बुतागे ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।
खोजव संगी मोर, कहां मनखे गंवागे ।।

सोमवार, 11 मई 2015

दाई

दाई मयारू घात हे, जेखर जग मा सोर ।
जेन नानपन ले करय, लइका मन ल सजोर ।।
लइका मन ल सजोर, करय तन मन ला हारे ।
सिरजावय जस पेड़, खून पसीना ला डारे ।।
अपन पेट ला काट, खवावय हमला भाई ।
परगट हे भगवान, धरे रूप हमरे दाई ।।

शनिवार, 9 मई 2015

सच अबरा डबरा

लबरा लबरा ले कहय, लबारी झन न मार ।
जान थंव तोला बने, कहिथस तै पच्चार ।।
कहिथस तै पच्चार, जीव मा जीव ल डारे ।
अइसन तोरे काम, गोठ कर कर के मारे ।।
कहय मुरूख ‘चैहान‘, परे सच अबरा डबरा ।
चारो कोती देख, दिखय रे लबरे लबरा ।।

गुरुवार, 7 मई 2015

आघू आघू रेंग तै

आघू आघू रेंग तै, पाछू ला झन देख ।
पाछू देखे डर लगय, हिम्मत अपन समेख ।
हिम्मत अपन समेख, छुये बर अपने मंजिल ।
हवस तै हर सजोर, संग मा तै तो संदिल ।।
कांटा-खूटी लांघ, डहर मा कर तै काबू ।
करत डहर ला पार, रेंगते रह तै आघू ।।

बुधवार, 6 मई 2015

दिल गे मोरे हार

कनिहा डोले तोर ओ, जइसे पीपर पान ।
जिंस पेंट तोला फभत, जइसे कंसा धान ।।
जइसे कंसा धान, पियर काया तोरे हे ।
मुॅहरंगी हा तोर, सुरूज ला मुॅह मा बोरे हे ।।
तोर तन के रूआब, लगय मोला जस धनिया ।
दिल गे मोरे हार, देख के तोरे कनिहा ।।

रखे कहां कुछु देह के

रखे कहां कुछु देह के, कब काहीं हो जाय ।
ना जाने कब देह मा, रोग राई समाय ।
रोग राई समाय, नाम कोनो रखाय के ।।
सड़क म कतका भीड़, रखे कबतक बचाय के ।।
कोनो देही ठोक, मंदहा मन तो घात दिखे ।
बचे भला रे कोन, जीव अपने देह रखे ।।

बाबू पैरी तोर

झुन झुन बाजय गोड़ मा, बाबू पैरी तोर ।
ठुमक ठुमक के रेंगना, दिल ला भाते मोर ।
दिल ला भाते मोर, तोर गिरना अउ उठना ।
रेंगइ माड़ी भार, रेंग के खुल-खुल हॅसना ।।
बलि-बलि जाय ‘रमेष‘, हॅंसी ला तोरे सुन सुन ।
देखय तोला जेन, तेन हर बोलय झुन झुन ।।

आखर

आखर के दू भेद हे, स्वर व्यंजन हे नाम ।
‘अ‘, ‘इ‘, ‘उ‘ कहाथे हास्व स्वर, बाकी ल गुरू जान ।
बाकी ल गुरू जान, भार लघु के हे दुगना ।
व्यंजन हास्व कहाय, लगे जेमा लघु स्वर ना ।।
व्यंजन गुरू कहाय, गुरू स्वर ले हो साचर ।
आघू के ला गुरू, बनाथे आधा आखर ।।

मंगलवार, 5 मई 2015

जमाना हा लगय नवा

नवा जमाना आय हे, सोच नवा हे लाय ।
सुने बात ला छोड़ के, खाय तभे पतिआय ।
खाय तभे पतिआय, फेर रस ला नइ जाने ।
करू-कस्सा के लाभ, बिमरहा नइ तो माने ।।
किरवा परथे मीठ, बात अब ले हवय जवा ।
अपन सुवारथ काज, जमाना हा लगय नवा।।

बोलबो छत्तीसगढ़ी

छत्तीसगढ़ी हा हवय, लोक भासा हमार ।
परबुधिया अउ सेखिया, कहे हमला गवार ।
कहे हमला गवार, उतर हमरे कोरा गा।
दू आखर ला जान, होय पर के छोरा गा ।।
बेर्रा मन ला छोड़, अपन भासा हमन गढ़ी ।
छाती हम तो तान, बोलबो छत्तीसगढ़ी ।।

शुक्रवार, 1 मई 2015

तरिया मा किरकेट

लइका मन खेलत हवय, तरिया मा किरकेट ।
जोहत पनिहारिन मन ल, कुॅआ खोये विकेट ।।
कुॅआ खोये विकेट, बावली झिरिया के बादे ।
हैण्ड़ पंप के बाद, बोर मोटर हा आगे ।।
चैका छक्का मार, करत हे पानी खइता ।
पाछू के तकलीफ, कहां जाने हे लइका ।।